स्थायी समाज व्यवस्था | Sthayi Samaj Vyavastha

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Sthayi Samaj Vyavastha by जे. सी. कुमारप्पा - J. C. Kumarappa

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ही में मोजू *+ ९६/ कुदरत में मोजूद व्यवस्थाएँ . ॐ. इस किस्म का अहिंसक सहयोग हरएक किस्म की चीजों मे हमेशा नहीं रहता । कुछ इकाइयों तमाम कुदरती परिस्थितियों में से न गुजरकर तथा स्वाभाविक तौर पर कुदरत की चीजो से मिल्नेवाली खुराक पर सन्तुष्ट न -रहकर कु द्रत कै लम्बे रास्ते को छोड़कर बीच का मागं हूँढ़ने की फिराक में अपने दी पड़ोसी जीवो का शिकार करती है । इसलिए हिसा निर्माण होती है और उनका विनाश निश्चित ही रहता है | , शै, परोपजीवी व्यवस्था--कुछ पौधे दूसरे पौधों पर बढ़ते हैं और इस प्रकार परोपजीवी वनते हँ । कुक असें के बाद मूल झाड़, उस पर उगनेवाले दूसरे झाड़ की बदौलत, सूखने लगता है और अन्त में मर जाता है। इससे भी हिंसा निर्माण होती है और विनाश निश्चित ही है| -जानव रें मेहम यदि देख, तो वचारी गरीब मेड घास खाती दै, पानी पीती ड ओर इस प्रकार अपनी जिन्दगी बसर कसती है | पर एक रोर कुद्रत का य = = 4 छ र्ण न त ब्स--न्दन-- =-= हीं ) सा 8. === 2 ञि --- स्य त उ चिन्न नं० १. दुसरे प्राणियो पर गुजर करनेवाला पक्षी रास्ता छोड़कर बीच का ही मार्ग निकालता है; याने वह भेड़ को मारकर उस प्र अपनी गुजर-ब्रसर करता है। इस प्रकार वह हिंसा को अपने २




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