श्री विष्णुपुराण संचित्र | Shri vishnupuran sachitra

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Shri vishnupuran  sachitra by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अ० २ | तदून्नह् परम नित्यमजसक्षयसव्ययसू । एकस्बरूप॑ हु सदा हेयाभावाच निमंठसू ॥१३॥। तदेव. सर्वसेवैतद्रयक्ताव्यक्तरमरूपवतू । तथा पुरुपरूपेण कालरूपेण च स्थितसू ॥3४॥। प्रस्य ब्रह्मणों रूप॑ पुरुषः प्रथमं दविज । घ्यक्ताव्यक्ते तथेवान्ये रूपे कालस्तथा परसू ॥१५। प्रधानपुरुषव्यक्त काठानां परम हि यह्‌ । पृदयन्ति सरयः शुद्ध त द्विग्णो। परम पदस्‌ू ॥9 5॥। प्रधानपुरुषव्यक्तक्ाठास्तु अधिभागधः । रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्धावहेतवः १७) व्यक्त विष्णुस्तथाव्यक्तं पुरुष: काल एव च । क्रीडतो बालकस्पेव वें तरथ निशासय ।॥१८॥। अव्यक्तं कारण यत्तत्प्रधानदपिसत्तमें) । ग्रोच्यते प्रकूतिः सरक्ष्मा नित्य सदसदात्मकस्‌ ॥।१९॥। अक्षय्य॑.. नान्यदाधारममेयमजरं 'घुवश । शब्दस्पर्शविहदीन॑ तद्रूपादिसिरसहितसू ॥२०॥। त्रिणु्ण तज्जगधोनिरनादिप्र भवाप्ययस्‌ । तेनाग्रे सबंसेवासीदयाएं वे प्रलयादनु ॥२१।॥। वेदवादविदों विद्न्नियता ज्रह्मवादिनः । पठन्ति चेतसेवार्थ श्रधानप्रतिपादकम् ॥२२।। नाहो न रात्रिने नमी न भूमि- नसीत्तमोज्योतिरथूच नान्यत्‌ । श्रोत्रादिवुद्धचानुपलभ्यमेकं प्राघानिकं ब्रह्म पुमांस्तदासीत ।! २३] प्रथम जंघ १५ अब्पय तया एकरूप होने और हेय गुणोके अभावके कारण विमंल परब्रह्म हे ॥ १०-१३ ॥ वही इन सब व्यक्त ( कार्य ) मोर भव्यक्त ( कारण ) जगतुके रूपसे, तथा [| इसके साक्षी ] पुरुष और [ महा- कारण |] कालके रूपसे स्थित हे ॥ १४ ॥ हे दविंज ! परब्रहमका प्रथम रूप पुरुष है, अव्यक्त ( फ्रकृति ) और व्यक्त ( महदादि ) उसके अन्य रूप हैं तथा [ सबको क्षोभित करनेवाला होनेसे ] काल उसका परमरूप है॥ १५ ॥ इस प्रकार जो प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल-इन चारोंसे परे है तथा जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं वही भगबाद्‌ विष्णुका विशुद्ध परम- पद है ॥ १६ ॥ प्रधान, पुदुष, व्यक्त और काल-- ये | भगवादु किष्णुके ] रूप पृथक्‌-पृथक्‌ू संसारकी उत्पत्ति, पालन भोर संहारके प्रकाश तथा उत्पादनमे कारण हैं ॥१७ ॥ सगवानु विष्णु व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष और कालरूप भी है, इस प्रकार बालवतु क्रीड़ा करते हुए उन भगवादुकी लीला श्रवण करो ॥ १८ ॥| उनमेसे अव्यक्त कारणको जो. सदसद्रप ( कारणशक्तिविदिष्ट ) ओर नित्य ( सदा एकरस ) है, श्रेष्ठ सुनिजन प्रधान तथा सुक्ष्म प्रकृति कहते हैं ॥ १९॥ वह क्षयपरहित है, उसका कोई अत्य माधार भी नही है तथा भप्रमेय, अजर, निश्चछ, दाब्द-स्पर्शादिशुन्य और रूपादिरहित है ॥ २० ॥ वहू त्रगुणमय भोर जगतुका कारण है तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लयसे रहित दे । यह सम्पूर्ण प्रपद्च प्रलयकालसे लेकर स्रष्टिकि आादितक उसीसे व्याप्त था ॥ २१॥ हे विद्वद्‌ ! श्रुतिके ममंको जाननेवाले, श्रुतिपरायण ब्रह्मवेत्ता महात्मागण इसी मथंको लक्ष्य करके प्रधानके प्रतिपादक इस ( निम्न- लिखित ) दलोकको कहा करते है--॥ २२॥ उस समय ( प्रलयकालमे ) न दिन था, न रात्रि थी, न गाकाश था, न पृथिवी थी, न मन्वकार था; न प्रकाश था मोर न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था। बस, श्रोब्नादि इन्द्रियो और बुद्धि मादिका मविषय एक प्रधाव ब्रह्मा पसष ही थार ॥ 23 ॥




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