बृहत्संहिता | Birhatsanhita

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूनिका । शथ ततः सांकेतमाऋम्य पंचालान्‌ मयुरास्तथा । यवना दुष्टविक्रान्ता प्राप्स्यन्ति कुसुमध्व जम ॥ ततः पुष्पपुरे प्राप्ते कदेमे प्रथिति हिंते । अकुछा। विषयाः से भाविष्यन्ति न संदायः ॥ दष्ठटयवनगण, साकेत पंचाल और मथुराको आक्रमण करके पाटलीपुत्र ( पटने ) में जाँयगे । कुप्सुमपुरमें जायकर उसको टुटेंगे और तैसनेस कर ढाछेँंगे । कानंसाहब कहते हैं कि व्याट्रीयरराजा; मिनाएडरके समयमें इंसबी सनसे १४४ व पहिले साकेतपर चढ़ाई हुई थी । अतएव इस 'चढाईसे पीछेह्दी गर्गसंहिताका ल्खिनेवाला हुआ । गर्गजीने अयनके तिष- यमें जो कुछ लिखा है उससे जाना जाता है कि उन्होंने यह विषय पराशरीसे छिया । क्योंकि अयनका झुभाशुम फू वर्णन करनेमें दोनोंने एकही मत प्रकाश किया है । यथाः परादारः- यदा प्रा्तो वेष्णावान्ते उदन्मार्ग प्रपथते । दाश्षिणेड्छेषां वा महाभयाय ॥ गरगंजी लिखते यदा निवत्तते प्राप्त: श्रविष्ठा मत्तरायणे । अछेषां दक्षिणो5प्राप्तर्तावदू विद्यान्‍्मइद्रयम्‌ ॥ दोनों श्लोकका एकही अर्थ है; धनिष्ठाके झोषतक गमन करनेसे सूर्यका उत्तरायण होता है और अशछेषातक गमन करके दक्षिणायन आरम्भ होनेपर महाभयकी दोका करनी चाहिये । पराशरजीके लेखकी प्राचोनता उनके छंदसेही प्रगट हो रही है । क्रान्तिपातका परिधिवत्‌ परिश्रमण हिन्दुज्योतिषियेंकि मध्यमें सबसे पहले वासिष्टसि- द्वान्तक ठेखक विष्णचन्द्रने प्रकट किया उनका मत है कि क्रान्तिपात एक कल्पमें २८९४१ वार परिश्रमण करता है; अतएव जाना जाता हैं कि उनके मतसे अयन प्रति वष ६०.०६ विकठा करके पूर्वमें अग्रसर होता है। यह मत ग्रीसवाठे हिपाकंस और टोछैमी इन दो ज्योतिषियोंकी पुस्तकसे लिया गया है अथवा स्वयम्‌ आयेज्योतिषियींका प्रकाश किया हुआ है; इस बातको हम मली भांति निर्णय नहीं कर सकते हैं । परन्तु दोनों तिषियोंकी निरूपण की हुई अयनकी वात्सरिक गतिकों निहारकर जाना आता है कि इसको विष्णुचंद्रने निरपेक्ष भावसे प्रगट किया । हिपार्कसके मतसे क्रान्तिपात प्राय ८५ वरषेमें एक अंश और टेठिमीके मतसे १०० वषमें एक अंश आगे बढता है। भास्करने लिखा हु; -दिरोमांणे द अध्याय | विषुवस्कान्तिवछयो: सम्पातः क्रान्तिपात। स्यात्‌ । तद्वगणाः सोरोक्ता व्यस्ता अयुतत्रयं कल्पे ॥ १७ ॥ अयनचलनं यदुक्तें मुज्नलाये: स एवायम्‌ । . उत्पन्षे तद्रगणाकल्पें गोहंगतेनन्दगोचन्द्रा। ॥ १८ ॥ विषुव और क्रांतिमंडढके मिलनको क्रान्तिपात कहते हैं । सूयसिद्धान्तके मतसे एक कल्पमें उसका भगण तीस हजार होता है । अयनचलन और क्रान्तिपात एकही बात है । मुंजला दिके मतसे एक कल्पमें अयनके १९९६६९ भगण होते हैं । दिरोमणिकी व्याख्या




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