मेवाड़ गाथा | Mevaar Gaatha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बचे बाग, अनाथ, हि अध रे प्र ११ २ ररे (३) प्रस्तावना । बा ला, हा लंच अप, अभि हक, अत, अर # चिता अधि अगर #च कद, आई, सच, कप लक, जग अधिक की पचि अ्ि #ि हि #च से साध ले, हक, अत, अलग, हू, अभि, अभि, बैन, # रण, सचि का शीए वे, सि अनि अचे, हि /िके प्राण देकर भो विमल निज मान रखने को प्रथा ।' शुचि स्.ति जिसकी हृदय को मा-भौमिक-भत्ति से, पूण करती भअतुलनोया दिव्य वेद्यत शक्ति से ॥ व वनिता बाल रखते ध्यान अपने मान का, मोह कुछ रखते न वे निज देह अधवा प्राण का। नष्ट हो सवेस, न पर बे त्यागते निज भीरता, ध्येय उनको मुख्य छोतो देशको खाधोनता ॥ गेह धन खो, नित्य चाहै विपिन में फिरना पढ़े, नित्य हो पद पद व्यथा दुख गत्ते ' में गिरना पढ़े, हार उनका ढ़ छइृदय तो भो कदापि न खायगा, अशग्नि-व्वाला तुल्य ऊपर को सदा हो जायगा ॥ देश गौरव रक्षणाथ सचेप्ट रहते हैं सभो, नाम फिर उनका कलझ्ित दया कहों होगा कभो ! पुत्र, दुच्चिता, स््रात, सब सड़ोत यह गाते सदा :-- “डेश-बलि के सामनी है तुच्छ सारो सम्पदा !” शौर्य साइस देख जिनके श्र, कहते “धन्य है, “वोरता में विख में तुमसा न कोई अन्य है।” छल रहित यह बीरता संसार में आदश है, सन्णों का घास पूज्य पवित्र भारतवर्ष है ॥ है सुसाधक मित्र ! सबला नाम अबला का यहीं; नारियाँ मेवार को सो क्या गई पाई. कह्ों ? प्‌ * गत्त -गढढ़ा ।




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