श्री कुञ्ज बिहारी स्मृति सुमन | Shri Kunj Bihari Smrati Suman

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Shri Kunj Bihari Smrati Suman by कुंजविहारी शर्मा - Kunjvihari Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(११) श्री कुलविद्वारी स्मृति सुमन पं० विह्वारीजो के निकट परिकर में जहां छात्रों, श्रमिकों, भ्रध्यापकों व साहित्यकारों की संख्या हजारों में है, वहां श्रोमन्तों की सख्या भी कम नहीं है । भषिकांशतः धीमस्तों को प्राकर्पित करने वाला श्रमिकों का श्रद्धय नहीं बनता, पर विहारीजो इसके शपवाद थे + वे सब के थे शोर सब उनके थे । उन्होंने भपनों परिधि में सबको समाहित रिया था । झपनत्व श्र परत्व क्रो भाषा में वे किसी से लगाव व दुराव नहीं रखते ये । हक डे चिंतन, भाषा-प्रयोग व व्यवहार मित्र-ममित्र की परिधि से मुक्त था उनका कोई श्रमित्र नहीं था । वे किसी के मित्र नहीं थे । उनका विस्तन, भाषा-प्रयोग व व्यवहार मित्र-ग्रमिष्र की परिधि से सुक्त था । मित्रता किसी प्रत्यक्त मिथ को प्रतिध्वनि होती है । वे इसे सुनने के झादी नहीं थे । यही कारण था, वे किसी सोमा से घिरे नहीं थे। जीवन-पथेन्त उन्मुक्त रहे श्रौर झ्रपन हर सांस को उन्होंने समपंण के साथ श्रनुस्पुत किया 1 विहारोजी के शिप्यों को सख्या से कडों-हजारों में है । उनके मिद्नों की सख्या भो उससे म्धिक ही है । मैंने श्रपने चुरू चतुर्मा्त (वि सं. २०२३) में थे अपने पास देठे हुये व्यक्ति को भी सचिन्त नहीं रहने देते थे । दो-चार क्षणों में हो वे बातावरण को स्मित हास्य में परिवत्तित कर देते थे। पद कि. ्ं दे सं संयोजन की जागरूकता




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