अर्चना के फूल | Archna Ke Phool

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Archna Ke Phool by कमला जैन - Kamala Jainश्रीचन्द सुराना 'सरस' - Srichand Surana Saras"
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
16 MB
कुल पृष्ठ :
357
श्रेणी :
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कमला जैन - Kamala Jain

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श्रीचन्द सुराना 'सरस' - Srichand Surana Saras"

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मानव कै सुल्यांकन का मांघार ७मिल जाती हैं, ऐसा भारतीय चिन्तन हू । अर्थात्‌ जीवन की जो इच्छाएँ हैं, वे वहाँ साकार हो जाती हैं । परन्तु क्या भापके ध्यान में यह बात नहीं आती है कि कल्प- वृक्ष के नीचे बैठकर अगर किसी बुरी चीज के लिए इच्छा करेंगे तो वह नहीं मिलेगी ? कल्पवृक्ष के अनुसार तो अवश्य मिलेगी । वहां तो कट्प है--अच्छा या वुरा जैसा मी है, वद्दीं तो कत्प के अनुसार फल मिलता है । भगर आप वहाँ भाकर अच्छा कल्प (विचार) संकल्प करते हैं तो भी वह देगा, भर दुविकल्प-- बुरा कल्प करते हैं तो मी वह देगा । कल्पवृक्ष का काम तो आपके अच्छे या बुरे विचार के अनुसार आपको देना है। वहाँ जाकर किसी को दूध पीने की इच्छा हुई तो दूध मी मिल जाएगा भोर दाराब पीने की इच्छा हुई तो शराब भी मिलेगी । मतलब यह है कि कह्पवृक्ष तो वही देगा, जो मापकी इच्छा है ।पुराणों में कल्पवृक्ष के सम्बन्च में एक कथा आती है । एक व्यक्ति नन्दनवन में चला गया भर कल्पवृक्ष के नीचे जाकर बेठ गया । वहाँ विचार करने लगा कि मुझ्ने जोर की भुख लग रही है, मगर मिष्टान्न मिल जाए तो आज की समस्या तो कम से कम हल हो जाय । उसके मिष्टान्न का विचार करते ही मिष्टान्न आ गया । कुछ देर बाद उसने विचार किया कि यह सब तो ठीक हो गया, लेकिन मेरे कपड़े तो फटे- चिथड़े-से हैं, सुन्दर वस्त्र भा जायें तो अच्छा हो । एक क्षण बाद सुन्दर वस्त्र भी भा गए । उसके बाद उसने जो-जो विचार किया-दविकल्प किया--वे सब कुछ पदाथे उसे प्राप्त हो गए । फिर उसने विचार किया कि “मरे ! कहीं भूत तो नहीं है, जो यह सब लाकर देता है ! भूत होगा भी तो मुझे क्या ?” यह सोचते ही वहाँ भूत था गया उसे खाने के लिए । वह हक्कावक्का होकर सोचने लगा 'अब क्या करू ? कहाँ जाऊँ ? इस कत्पवृक्ष को छोड़कर ।' यह सोचते ही कल्पवृक्ष से उसका छुटकारा हो जाता है।इस पौराणिक कथा में भूत का व्यंग्य हो सकता है। इसमें कथाकार का तात्पयं यह है कि इस कथा में व्यंग्य जरूर है, पर वह जीवन पर व्यंग्य है। मानव- जीवन को लक्ष्य में रखकर यह व्यंग्य किया गया है। जब तक मनुष्य के मन में सुश्दर संकल्प आए, तब तक त्दनुसार भोजन-वस्त्र बादि सब कुछ कल्पवृक्ष ने दिये | परम्तु ज्यों ही विकल्प बदले कि भूत का काम मालूम होने लगा । भूत भी खाने को भा गया । वह भूत विचारों का ही भूत है । खराब विचारों का भूत मन में आता है, तो वह मनुष्य के सुन्दर जीवन को खाने के लिए आता है । हमें शब्दार्थ पर न जा कर उसके मावार्थ पर जाना चाहिए । क्योंकि न तो कल्पवृक्ष मापने देखा है, न हमने । कल्पवृक्ष अज्ञात है, हमारे सामने प्रत्यक्ष नहीं है, तब हम उसके शब्दार्थ पर क्यों जायें ? भावाथें पर हो हमें विचार करना चाहिए ।हाँ तो, कल्पवृक्ष का माव दया है ? यही कि जीवन रूपी नन्दनवन में तुम्हारे संकल्प या दुविकल्प की पति करने वाला कल्पवृक्ष है । अगर तुम्हारा कल्प--संकल्प जसा है तो तुम्हारे जीवन का निर्माण भी त्तदनुसार ही होगा । तुम्हें अगर जीवन का




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