भारतीय अर्थ शास्त्र भाग 1 | Bhartiya Arth Shastra Bhag 1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१४) है। परंतु उसे घधिकतम उपयोगी बनाने के लिये देश की दशा का झच्छा ज्ञान होना झनिवाये है, देश के श्राधिक तथा नेतिक विपयों की विवेचना आवश्यक है । ये विपय क्िस्से-कहानियों या उपन्यासों की तरह रोचक श्रथवा रण-भूमि के चृत्तांतों की तरह उत्तेजक न होने पर भी धार्मिक अंथों की तरह कल्याणकारी हैं । इस समय देंगश के लिये राजनीतिक स्वाधीनता के साथ यदि श्रार्थिक स्वावदावन अआवश्यक है, तो श्रथ-शाख्र के श्ध्ययन: की ओर उपेक्षा का भाव रहना कदापि उचित न होगा । उसे सादर, सहप अहण करना चाहिए । श्र्थ-शासा का श्ाघार वास्तविक परिस्थिति है । अतएव इस विपय की रचना के लिये लेखक को झनेकों पस्तकों, रिपोर्टों ओर पत्र-पत्रिकाओं की सहायता लेकर वदुत कुछ संकलन-काये करना पढ़ता हैं । इस सामभ्री के श्रनुकूल रहकर ही वह श्रपनी विचार- स्वतंत्रता प्रकट कर सकता है, उससे श्रथक्‌ नहीं । इसलिये ऐसी पुस्तकों में वैसी मोलिकता नहीं मिल सकती, जो उच्च कोटि के कल्पनात्मक या झादर्शदादी सादित्य में होती है । भपनी परिस्थिति के श्रनुसार मैंने इस पुस्तक को यथाशक्ति श्रत्युत्तम बनाने का प्रयत्न किया है । इसमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह तो मर्मज्ञ पाठक ही जानें; परंतु मुझे थ्ाशा दे, अपने ढंग की झर्थ-शास्त्र- संबंधी यह पहली ही पुस्तक हैं । यह विचार करके सहदय पाठक मेरी चुटियों को क्षमा करेंगे । इस पुस्तक के खंडों के संबंध में सुके दो बातें विशेष रूप से कहनी ४ । अथ-शास््र के पाठक जानत हक प्रायः उपभोग (005पाएए1[- छिएए ) के संबंध में झंगरेज़ी पुस्तकों में बहुत कम विचार किया जाता है । परंतु वह विपय दे बहुत उपयोगी । अतः मैंने उस पर भी यधेष्टर प्रकाश डालने का .प्रयल किया है । फिर राजस्व के संबंध




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