वृहत जैनपद संग्रह | Vrihat Jainpad Sangrah

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Vrihat Jainpad Sangrah by सतीश चंद्र - Satish Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बुघजन विलास । [9हो० ॥ टेक ॥ झादि अन्त अविरुद्ध वचनते, संशय श्रम निखारोगी ॥ हो० ॥ १॥ ज्यों प्रति- पालत गाय बत्सकों, त्यों ही मुखकों पारोगी। सनसुख काल बाघ जब झावे, तव तत्काल उवा- रोगी ॥ हो० ॥ २ ॥ बुधजन दास वीनवे माता, या विनती उर धारोगी । उलसि रदयो हूं लोह- जालसें, ताकों तुम सुरमारोगी ॥ हो० ॥ ३॥ ११ राग--घिलाचर्ठ कनड़ी । मनकें हरष झापार--चितकें ' हरव अपार, वानी सुनि ॥ टेक ॥ ज्यों तिरषाठुर अन्त पोवत, चातक अंबुदद घार ॥ वानी सुनि० ॥ १ ॥ सिथ्या तिमिर गयो ततखिन हो, संशयलरम निवार। तत्त्वारथ अपने उर दरस्थो, जानि लियो निज सार ॥ चानी सुनि० ॥ २ ॥ इन्द नरिंद फर्निंद पदीघर, दीसत रंक लगार । ऐसा आनंद बुधज- नके उर, उपज्यो झपरंपार ॥ वानी सुनि० ॥शे॥ १९ राग--अलहिया । चन्दजिनेसुर नाथ हमारा, महासेनसुत#जच्ध था नि




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