रंगमंच | Rangmanch

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Rangmanch by शेल्डान बेनी - Sheldan Beniश्री कृष्णदास जी - Shree Krishndas Jee

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श्री कृष्णदास जी - Shree Krishndas Jee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ कि रंगमंच परन्तु जन साधारण में डायोनिशस की प्रतिष्ठा सबसे पहिले प्रकृति और वन्य जनों के तथा समस्त मानवीय एवं दैवी आहलादकारी भावनाओं के देवता के रूप में हुई। लोगों को भान हुआ कि धरती, खेतों, जंगलों, मधुवनों के सभी देवता मानो इसी देवता के आविर्भाव की राह देख रहे थे । अब यह देवता डायोनिदास, बाक्कुस, ब्रोमियस एवं नीसियस के नाम से प्रसिद्ध हो गया । तत्काल मादक मदिरा और अलौकिक प्रेरणा के इस देवता ने अपने भक्तों और उत्सवकारियों को आध्यात्मिक मादकता से अभिभूत कर दिया । वह उनके व्यक्तित्व में प्रवेश कर गया । उन्होंने स्वयं बाकांत और बाकंती के नाम से देवत्व का स्थान प्राप्त किया; डायोनिशस का अनुभव प्राप्त किया । उसने लोगों को इस बात के लिए विवश नहीं किया कि वे उसकी पूजा अर्चना करें। वरन्‌ उसने अपने आनन्द में उन लोगों को भी साझीदार बनाया । उन्होंने देवताओं की भाँति उत्सव किया, इस उत्सव में आनन्द लिया, नृत्य किया, गीत गाये, जुलूस निकाले । नाटक का उद्भव सीधे इन्हीं डायोनीशियन उत्सवों से हुआ । डायोनिशस के सम्मान में जो विधियाँ सम्पन्न हुईं ; जो नृत्य हुए, गीत गाये गये, हाथ में तुरुही और मशाल लेकर तथा मुखपर चेहरे लगाकर जो जुलूस निकाले गये उन्हीं सबसे नाटक का आविर्भाव हुआ । और जिस पवित्र स्थान पर यह उत्सव मनाया गया उसे थियेटर (रंगशाला ) कहा गया। इन उत्सवों में भाग लेने वाले कुछ लोग पुरोहित हो गये और वही वाद में अभिनेता कहे गये । और दूसरे लोग जिन्होंने गायन में नेतृत्व किया, जिन्होंने नये गीत बनाये, वे कवि कहे गये । और लोग दर्शक बने । ये वे छोग थे जो कि केवल डायोनिशस के आनन्दोत्सवों के उस भावनामूछक नैर्सागिक सुख में भाग लेना चाहते थे । युग-युगान्तर में नाटकों के सम्बन्ध में जो सबसे बड़ी बात रही है वह थी डायो- नीशियन मादकता, भावनामूलक-आध्यात्मिक सहयोग से उत्पन्न नैसर्शिक आनन्द, अलौकिक नाटकीय अनुभव । किसी अन्य देवता ने मनुष्य के अन्तर-देवत्व को इस प्रकार खोजकर नहीं निकाला, किसी अन्य कला ने कछाकारों की अलौकिक सृजनशीलता और दर्शकों को आत्मा की ग्रहणशीकतता में इतना सहज संबंध स्थापित नहीं किया, दरशक- जनता को आत्मा के प्रकाश में इस तरह नहीं डुबोया । डायोनिशस पचीस सौ वर्षों तक जीवित रहा है। आज, वही संसार जो उसे घूणा करने लगा था,फिर उसकी ओर उन्मुख हो रहा है। उसकी आत्मा में वही पुरानी भूख हैं। पवित्र आध्यात्मिक जीवन के प्रति वही प्राचीन आकषण है। निर्वाध आनन्द के प्रति वह्दी मोह है। डायोनीशियन युग के बाद के हम लोग जब अपने चारों ओर नैतिक धर्मों का पतन देखते हैं, विषयोन्मत्त सम्यताओं द्वारा उत्पन्न अराजकता पर दृष्टिपात




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