आत्म रचना अथवा आश्रमी शिक्षा भाग 3 | Aatam Rachna Athwa Aashrami Shiksha (Vol III)

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Aatam Rachna Athwa Aashrami Shiksha (Vol III) by जुगतराम दवे - Jugatram Daveरामनारायण चौधरी - Ramanarayan Chaudhari

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रामनारायण चौधरी - Ramanarayan Chaudhari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रबचन पद हमारा प्यारा गांव हम गावोको अपनी सेवाका क्षेत्र बनाना चाहते है। भुसके लिखे हमारी सारी तैयारी और तालीम चल रही है। मिसलिजे हम अपने आश्रम गावोमे ही खोलते है, और ग्रामवासियोके बीच ही हमें अपना सारा जीवन बिताना है। लेकिन लोग नौकरी-धपेके लिअे जैसे बम्बऔ, कराची और कलकत्ता जाते हूं, बसे हम गावोमें रहनेके लिमे नहीं जाते । वे कामधघेके स्थानमें चाहें जितने साल रहें, फिर भी अपनी दृप्टि सदा जन्मभूमिकी तरफ ही रखते है। वे वहा अपनेको परदेशी ही मानते है, भर चाहे जितने लवे अर्से तक रहें, फिर भी वृत्ति बसी रखते है, मानो मुसाफिरखानेंगें अेक रातके छिमे विश्राम किया हो । वे मुतना ही स्नेह-सवध वहीं रखते है, जिसके बिना काम ही न चले, और अपनी कमाओरमें से भुतना ही खर्चे करते है, जितना खर्च करना अनिवार्य हो। वहाके लोगोके सुख-दुख या सावंजनिक जीवनसे वे बिलकुल अलग रहने ह। जिस तरह कमाभी करनेके हेतुसे गये हो, तो भी लोग अपने धघेके क्षेत्रमें परदेशियों जैसा व्यवहार करें, मुसमें से केवल लेते ही रहे परन्तु वापस कुछ न दें, यह वास्तवसे अनीति है, समाज-द्रोह है, मेसा हम लोग मानते हू । तब अपने पसन्द किये हुआ ग्रामक्षेत्रमें तो हम मैसा व्यवहार कर ह्टी कसे सकते हू? हम वहा कमानेके लिअजे नहीं, सेवा करनेके लिअे ही जाते है। वहा जाकर कुछ कमाभी होने पर हम वापस घर जानेंके स्वप्न नहीं देखते । सेवाक्षेत्रमें थी हमारी सोची हुओ सेवा पूरी होनेके बाद कृतार्थ होकर निश्चिन्ततासे घर जाकर आराम करेंगे, असी कल्पना भी हम नहीं कर सकते । मान लीजिये कि पहले हमारा विचार केवछ गावमे घर-घर चरखा शुरू करवा देनेका है। हम भाग्यवान ही भौर दस-पाच चर्षमें शायद जितना कर सकें, तो क्या गाव छोडनेके लिअे हम मुक्त हो सकेंगे *? नही, वहाके लोगोंने हमें अच्छा जवाब दिया; शथिस कारणसे तो हमारे मनमें वहा रुकनेकी, अपना समय बढा देनेकी और कार्येका विस्तार करनेकी ही जिच्छा होनी चाहिये । अभी गावोमें अनेक गृह-अद्योग विकसित करने बाकी है, अभी ब्रेकारीका रोग गावोमें से गया नही है, अभी लोगोनें अस्पृश्योको पूरी तरह अप- ताया नहीं है, अभी लोगोमे ग्राम-स्व राज्यकी सुन्दर व्यवस्था करनेकी क्षमता सही भागी है-- जिस प्रकार सोचें तो हमें अेकके वाद अंक काम सूझते जायेंगे, और जैसे- जसे सफलता मिलती जायगी वैसे-वैसे और नये काम निकालनेका सुत्साह बढ़ता जायगा । असा करते हुअ देदशमें हमारे विचारोके अनुसार राज्य-परिवर्तन हो जाय और जनताके प्रतिनिधि देशका शासन-ततर सभाल ले तो * फिर तो हमारी नौकरी पुरी हो गओी न” फिर तो घर जाकर पेन्शन खाते हुजे आरामकी जिन्दगी वितानेका हमारा हक है न ?




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