कहानी - एक कला | Kahani Ek Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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च कद्दानी क्‍या है १प्रथसव' कद्दानी हो, द्वितीयत 'शाकार में वद्द यथासंभव छोटी हो ओर ठतीयत कुछ ओर भी हो। केवल श्ाकार मे छोटी होने ही से कोई कहानी कद्दानी कहने योग्य नद्दीं वन जाती । दमारे यहाँ श्रठारदद पुराणों मे, ईसाइयों के धर्मप्रंथ वाइबिल आदि मे ऐसी कहानियाँ एकाघ नह्दीं, वरन्‌ नेक हूं, जो आकार ;में चहुत छोटी हैं, फिर भी हम उन्हें कद्दानी की ाख्या नहीं दे सकते । कद्दानी का जो तात्पये श्ञाये दिन लगाया जाता है; रच इन सवों से परे है। उसकी कुछ ओर दी विशेषता है, उसके (कुछ घ्नार दी लक्षण हैं, जो इनसे सवेधा भिन्न हू | १. इस तरदद कद्दानी के दम दीन भेद कर सकते ह--उपाख्यान झथवा 'ाख्यायिका, स्केच ( 5०७०! ) मोर कहानी श्रथवा “जार सा ाख्यायिका्ओों के नमूने पुराणों 'ओर ् बाइविलों में भरे पड़े हूं भीर संभवत. उस पे कोटि की कहानियों उनके श्लावे संसार में वहुत 'धिक न्यत्र न मिलेंगी । हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में 1 नित्यप्रति जितनी कहानियों प्रकाशित हुआ करती हैं, उनमें प्राय ₹झाधी से अधिक कहानियों कद्दानियों नहीं, 'झपितु स्केच एहैं। यथार्धतया जो गुण तथा चद्देश्य कहानियों में होने चाहिये, [उनका उनमे अभाव पाया जाता है । इन दोनों, उपाख्यान योर स्केच से परे स्थान है कहानो का । कद्दानी छोर स्केच में बहुत 'ातर है । कहानियों में वणित घटनाएँ एक दूसरे से मिनन फरके




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