विश्वामित्र और दो भाव - नाट्य | Vishvamitra Aur Do Bhav Natya
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
163
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ब्रिप 'चिधोग से सभी 'श्रहू सल घुस गया!
हृदय, प्रेस कादम्स पियो प्राकण्ठ तक
तारों सुधा, पिपासादुल नर की सुखद
शुभ्न प्रेम पी मदिर हुदय फी वेतना ।
श्रो मानव तुम कितने सुन्दर मधुर हो ।
कितने ऊेचे हृदयवान, जाना स था 1
पुष्प भी कहता है--
श्रो रमरपी, सनार तुम्हीं हो प्रारय का
सें श्रज्ञानी सूंढ, सूल सा था गया ।
नारी श्रपने को श्रौर पुरुप को पहचान कर वह उठती है--
श्ररे नहों मानव मद को है प्यास ही
घहू॒ नारी के सुखद स्वप्न के जगत में
हेंस जाता श्रॉघो में श्राकर जब कभी
हर ट ८
क्रोध, मान, झपमान, भत्सना, ताइड़ना
कहाँ न जाने कहाँ भाग जाते सभी
श्रौर हृदय पानी सा होफर सतत हो
बहने लगता हैं वाह में प्रेस में ।
श्रो प्रिय, श्रो प्रिय
बहू मेनका ऋषि से ग्ार्निगन घद्ध हो जाती है। विद्ुद्ध सारीत्व का
पुस्पत्त्र से सघर्प समाप्त हो जाता है दोनों के संयोग में । इसके वाद का
नारीत्व मातुस्वरुूम में जागृत होता है । पुरुप कि घ्रति नारी का सघपे
मापृत्व मे जाकर समाप्त हो जाता है पर पुरुप से फिर पुराने सस्कार
जागन होति हैं ।
मेनका स्वात्मजा बालिका को देस श्रावेग श्ौर उल्लास से
कहती है
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