अलका | Alka

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Alka by गंगा- ग्रंथागार

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' - Shri Suryakant Tripathi 'Nirala'

Add Infomation AboutShri Suryakant TripathiNirala'

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
अलका रुक हुए गए बहू क्यों नह्दीं श्ाए ? उस घर से अच्छा था सगता शा जैसे दे आदमी बहुत दूर हों इतने नजदाक रहकर भी साथ नजदीक का कोई बताव नहीं करते । रह-रहकर से गला सर खाता हे पर रोती नहीं दुग्ख बार बढ़ता हैं शाम हो चुकी । घरनघर सरकार की विजय के दीपक जलाना लगे डर पर ध्ोर प्यारलाल के सकान में सब अगह से ज्यादा प्रकाश . । प्यारलाण की खरी लड़के लड़कियों द्वार पर ेठी प्रसन्न आँखों से दीपों का सकाश देख रही हैं इसी समय शोभा की इमन्डस गाँव की एक लड़की कहारों की भीतर गई | शोभा से डूबी हुई थी लड़की ने धीरे से छू दिया । इसका साम राघा हि । इसकी मा शोभा के यहाँ दहन करती थी इसी इम्प्रह्मूप॑ंजा में गुजर गई है। राधा पड़ास के एफ कहार फे थहाँ रहती थी । उसके शौहर को खबर कर री गई थी । छत जह अपनी छी को ले जाने के लिये आया है । सुबह बह चली जायगी | सागा से सिल्लम आई है । फिरकर सोखा ने देखा राधा है । राधा सका बेठ गई कोर उसके एक घोण की मुट्ठी छापने दानों हाथा मे भर सा छत धीरे सतेक पुष्ना का ४ तो नहा पप्न। शोधा सच आँखों की सुरकाई हि से दखकर माली | पकज़ दो जाती हैं | छाए हैं । एक बात मालूम हुई । नह नहीं नोफर हैं जिनसे यह गाँव है । उन्हें मालूम हुआ हैं महापेब की कुल काररुज़ारी झूठ तुम्हें फँसाने के सिंये




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now