गांधी - श्रद्धांजलि - ग्रंथ | Gandhi - Shraddhanjali - Granth

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Gandhi - Shraddhanjali - Granth by सर्वपल्ली राधाकृष्णन - Sarvpalli Radhakrishnan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्० गांधी-श्रद्धांजलि-प्रंथ होते देखते हैं । उनके निर्माण में दाताब्दियां गुजरीं और उनकी जड़ें युगों तक फैल गई हें । ऐसी दशा में युग-दुलंभ और अद्भुत आत्मा की मृत्यु का समाचार सुन- कर दुनिया का भय से कंपित और दु ख से कातर हो उठना कोई आशरचये की बात नहीं थी । राष्ट्रपति ट्रमेन ने कहा था, “मनुष्यों में से एक देव उठ गया । यह कृदकाय छोटा-सा व्यक्ति अपनी आत्मा की महानता के कारण मनुष्यों में देव था ।” अपने-अपने क्षेत्र में बड़े और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी उनके निकट खड़े होने पर छोटे और तुच्छ दिखलाई पड़ते थे । उनकी आत्मा की गहरी सच्चाई, घृणा और द्ेष से उनका मुक्त रहना, अपने पर पूर्ण अधिकार, मित्रतापूर्ण सबको मिलानवाली उनकी करुणा और इतिहास की अन्य महान हस्तियों के समान आत्मपतन के आगे शरीर के बलिदान को नगण्य माननेवाला वह विश्वास, जिसको उन्होंने कई बार बड़ो नाटकीय परिस्थितियों में सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा, आदि गुण ही आज जीवन की इस अन्तिम परिणति में जीवन पर धर्म की, विदव की बदलती समस्याओं पर अमर गुणों की जीत के द्योतक हैं । साधारणतया जिसे धर्म कहा जाता है वही उनके जीवन की प्रेरणा थी, किन्तु धर्म का अथे उनकी दुष्टि में मत विशेष के प्रति आग्रह अथवा शास्त्रोक्त पूजा-उपासना के व्यवहार तक ही सीमित न था, वरन्‌ धर्म का उनका अर्थ था सत्य, प्रेम और न्याय के मूल्यों में अडिग और अगाध श्रद्धा तथा उन्हें इसी दुनिया में प्राप्त करने का सतत प्रयत्न । लगभग पन्द्रह वर्ष पुर्वे मेंने धर्म के विषय में उनकी राय पूछी थी । उन्होंने उसे इन शब्दों में व्यक्त किया था--“में अपने धर्म को प्राय: सत्य का धर्म कहता हें । अभी पिछले दिनों से ईश्वर सत्य है' यह कहने के बजाय 'सत्य ही ईदवर है' ऐसा में कहने लगा हूँ, ताकि में अपने धर्म की अधिक व्यापक व्याख्या कर सकं । सत्य के अतिरिक्त अन्य और कोई भी चीज मेरे ईद्वर की इतनी पुर्णता के साथ व्याख्या नहीं करती । परमात्मा का निषेध हमने सुना हैं, पर सत्य का निषेध कोई नहीं करता । मनुष्य-जाति में मूखंतम लोग भी अपने भीतर सत्य का कुछ प्रकाश रखते हें । हम सब सत्य के ही ज्योति-कण हैं । इन ज्योति-कणों का यह संयुक्त रूप अवर्णनीय है, क्योंकि सत्य का ईदवरीय रूप हम भभीतक नहीं समझ पाये हैं । निरन्तर उपासना से इसके निकटतर पहुँच अवश्य रहा हूं ।' “सत्यं-ज्ञान॑ अनन्त ब्रह्म' अर्थात्‌ सत्य ज्ञान ही अनन्त ब्रह्म है, ऐसा उप- निददों में भी कहा गया हूं । परमात्मा सत्यनारायण अर्थात्‌ सत्य का स्वामी हू ।




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