आशापर्व | Asha Parva

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Asha Parva by सुमित्रा कुमारी सिन्हा - Sumitra Kumari Sinha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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त्राठ दामिनि कमक उठी होगी त्रम्बर की श्याम-दटा पर ; युगल नयन भी नीरव बरसे होंगे उसी. घटा. भर ॥ चले जा रहे होंगे तुम रो दूर देश के वासी | चली रात भी, चले मेघ भी ; चलने... के. आ्रम्यासी । दूर देश की. बिछुड़न बनती होगी सजल कहानी । कभी मिलन बन गई न जाने क्यों राहें श्रनजानी । शैन बसेरा पल भर का फिर चल ही. दिये, बटोही ! भोली कलियों को काँटों की त्रोट किये, निर्मोष्टी ! जगा न भोर,न कलियाँ विहूंसी मूदुल समीर न. डोली | गीत दिये सो भी पूर्ण ; मर सकी न निधन भोली |




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