बोलों के देवता | Bolon Ke Devata

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Bolon Ke Devata by सुमित्रा कुमारी सिन्हा - Sumitra Kumari Sinha

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about सुमित्रा कुमारी सिन्हा - Sumitra Kumari Sinha

Add Infomation AboutSumitra Kumari Sinha

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
रात के गहरे अँघेरे में उड़ा जो उस विहग को मिल मई प्रातः किरण भी! ताप से मिल तरलता बस मेघ जाती पेठता जो सिन्धु, पाता रत्न-थाती भावना ऊँची लिये सागर-लहर भी उछल कर हु क्षितिज की सीमा डुबाती वरण जिसने कर लिया जीवन चिरन्तन हो गया अनुगत सदा उसका मरण भी ! स्वप्न आते नींद के, दुग मींचने पर लक्ष्य बेषे शर, धनुष को खींचने पर शुष्क धरती के हृदय में बीज बो कर लहलहा अंक्र निकलते सींचने पर जो पथी चलता रहा विश्ञाम खोकर स्नेह ने उठ कर उसे दी मधु-शरण भी ! न्धनो फौ भीख पाती मुक्तिका घन प्रलय से ही झाँकता है सृष्ठि का तन गंज उठते हँ भविष्यत्‌-प्राण उसके भर चुका ह विगत सें जो सान निस्वनं धूलि बनकर पंथ में जो बिछ गई हो डस अगतिं पर उभर जते गसि-चरणः भौ । > {+ £) ( ७ )




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now