महाप्रयाण | Mahaprayan

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Mahaprayan by सीताराम गोस्वामी -Seetaram Goswami

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ महा-प्रयाण जिन्दगी पर गदरी छाप छोड़ गये, उन्हें दत्यधिक आकर्षित कर गये; हु हि पं क मर -कवि रायचन्द वैक्तिम सम्पकं से. टाल्सटाय श्र रस्किन शपनी पुस्तकों से | बश्चई सें वकील के रूप में गांधी जी मे पहने-पहल बस्बई में वकालत शुरू की; किम्तु सफलता न मिली । चार पांच महीने से अधिक अ्राप बम्बई में नहीं रह सके । कारण, खर्च श्रढ़ रहा था शरीर द्ामदनी उतनी होती नहीं थी | छा 1! (घघन्ल ८्पए में आपको एक सुकदमा पिला | श्राप मुद्दुई-पच्च के चकील थे : तीस रुपये की फीसपर काम करने को तैयार हुए थे | मुकदमे की जिरद शुरू हुई । मुद्दालह के गवाद से सवाल करने को उठे, पर कुछ बोन्न न सके । उन्हें जैसे चक्कर श्राने लगा । कोई सवाल ही उन्हें नहीं सूझता । अपनी शसमथता कबूल करते हुए अपने मुद्दई को फीस का रुपया बापिस कर दिया आर सलाद दी कि वह पटेल सादर से झ्पने पच्च की ब्हुस कराये । तबसे श्राप फिर कभी तत्र तक कोट न गये जब' तक कि आप दक्षिण शरफ्रीका न चले गये | बम्बई में एक श्रौर सुझदमा इनके हाथ में या था | उसमें श्रापकों सिप श्रर्जी तंयार करनी थी । श्रापकों विश्वास हुआ कि श्राप यह काम गच्छी तरह कर सकते हैं ! तत्पश्नात्‌ यह तय हुब्रा कि गांधी जी राजकोट में ही रहेंगे । उनके बढ़े भ'ई जो स्वयं वकील थे उन्हें श्रर्जा तैयार करने का काम दिया करेंगे । इस तरह श्राप प्रति सास शसत ३००, रु० की आय करने लगे । एक बार गांवी जी के भाई से गांधी जी से राजकोट के राजनीतिक दूत से श्रपनी सिफारिश करने को कहा । गांधी जी इस व्यक्ति से इडलेण्ड से ही परिचित थे | झ्निच्छा रहते हुए; भी भाई की खातिर झाप उससे मिलने गये | पर दूतने गांधी जी को अभद्रता पूर्वक बह्दं से




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