महाप्रयाण | Mahaprayan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : महाप्रयाण  - Mahaprayan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about सीताराम गोस्वामी -Seetaram Goswami

Add Infomation AboutSeetaram Goswami

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१४ महा-प्रयाणजिन्दगी पर गदरी छाप छोड़ गये, उन्हें दत्यधिक आकर्षित कर गये; हु हि पं क मर-कवि रायचन्द वैक्तिम सम्पकं से. टाल्सटाय श्र रस्किन शपनीपुस्तकों से |बश्चई सें वकील के रूप मेंगांधी जी मे पहने-पहल बस्बई में वकालत शुरू की; किम्तु सफलता न मिली । चार पांच महीने से अधिक अ्राप बम्बई में नहीं रह सके । कारण, खर्च श्रढ़ रहा था शरीर द्ामदनी उतनी होती नहीं थी | छा 1! (घघन्ल ८्पए में आपको एक सुकदमा पिला | श्राप मुद्दुई-पच्च के चकील थे : तीस रुपये की फीसपर काम करने को तैयार हुए थे | मुकदमे की जिरद शुरू हुई । मुद्दालह के गवाद से सवाल करने को उठे, पर कुछ बोन्न न सके । उन्हें जैसे चक्कर श्राने लगा । कोई सवाल ही उन्हें नहीं सूझता । अपनी शसमथता कबूल करते हुए अपने मुद्दई को फीस का रुपया बापिस कर दिया आर सलाद दी कि वह पटेल सादर से झ्पने पच्च की ब्हुस कराये ।तबसे श्राप फिर कभी तत्र तक कोट न गये जब' तक कि आप दक्षिण शरफ्रीका न चले गये | बम्बई में एक श्रौर सुझदमा इनके हाथ में या था | उसमें श्रापकों सिप श्रर्जी तंयार करनी थी । श्रापकों विश्वास हुआ कि श्राप यह काम गच्छी तरह कर सकते हैं !तत्पश्नात्‌ यह तय हुब्रा कि गांधी जी राजकोट में ही रहेंगे । उनके बढ़े भ'ई जो स्वयं वकील थे उन्हें श्रर्जा तैयार करने का काम दिया करेंगे । इस तरह श्राप प्रति सास शसत ३००, रु० की आय करने लगे ।एक बार गांवी जी के भाई से गांधी जी से राजकोट के राजनीतिक दूत से श्रपनी सिफारिश करने को कहा । गांधी जी इस व्यक्ति से इडलेण्ड से ही परिचित थे | झ्निच्छा रहते हुए; भी भाई की खातिर झाप उससे मिलने गये | पर दूतने गांधी जी को अभद्रता पूर्वक बह्दं से




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now