भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ भाग - 2 | Bharat Ke Digambar Jain Tirth Bhag - 2

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ भाग - 2  - Bharat Ke Digambar Jain Tirth Bhag - 2
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about बलभद्र जैन - Balbhadra Jain

Add Infomation AboutBalbhadra Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
भारतकें दिगम्यर मेन लोमधुरातें सर्वेप्रे सी .मु्तियाँ उपक्तष्ण होती हैं, जिंन प्रतिमांजंके चरगोंकि ..पास 'नरत्र-कण्द मिंख्ता है। कोर यी. लंगीटसे'चिद्लित प्रतिमाओंकि सिर्माणका काल तो गुप्तोत्र युर्ण भागा जाता सै. कौर वेस: संसय भी... '... इस प्रकारंकी, प्रतिसाओीका निर्माण अपनाद ही माना जा. सकता है। कं, स्‍ गत सा 1 , 7... ' जब सिरप्स्य जैन संघर्म-से फूटकर दवेताम्बर सम्यदाय निकला, तो उसे एक संम्प्रदोयेंके रूपमें कंपंबस्थित ' रूप लेमेमें ही काफी समय लग. गया । इतिहासकी दुष्टिति इसे ईसाकी छठी शताब्दी माना. समा हैं+, इसके... मी पर्योत्त समयके बाद बीतराग तौथकर मूतियोंपर वस्त्रके चिह्ठका अंकन किया गंया । भौरे-घीरें यह विकार ._ अंढ़ते-बढ़ते यहाँ तक पहुँच गया कि जिने-मूर्तियाँ वस्त्रालंकारोंसे आच्छावित होने लगीं और उसको वीतसागता . - इस परिम्रहके आइम्बरमें दब गयी । किम्तु दिगस्व्र परम्परामें भगवान तीथकरके वीतरोग , रूपकी ,रता . जवतक सशुष्ण रूपसे चली भा रही है ।तीर्ध-क्षेत्रोंमें प्राचीन कालसे स्तूप, आयागपट्, घर्मचक्र, अष्ट प्रातिहार्य युक्त तीथंकर मूर्तियोंका निर्भाण होता था और वे जैत कलाके अप्रतिम अंग माने जाते थे । किन्तु १ १वीं-१२वीं शततान्दिमोंके बादसे तो प्राय: इनका निर्माण समाप्त-सा हो गया । इस बीसवीं शताब्दी में अ।कर मूर्ति और मन्दिरोंका निर्माण संख्याको दृष्टिसे तो बहुत हुआ है किन्तु अब तीरथकर-मूतियाँ एकाकी बनती हैं, उनमें न भष्ट प्रातिहार्थकी संयोजना होती है, न उनका कोई परिकर होता है । उनमें भावाभिव्यंजना और सौन्दर्कका अंकल सजीव होता है ।पुजांकी विधि और उसका क्रमिक-विकासश्रावकके दैनिक आवश्यक कर्मोमें झाचार्य कुन्दकुन्दने प्राभूतमें तथा वरांगचरित और हरिवंश-पुराणमें दान, पूजा, तप भौर शील ये चार कर्म बतलाये हैं । भगवज्जिनसेनने इसको अधिक व्यापक बनाकर पजा वार्ला, दान, स्वाध्याय, संयम और तपको श्रावकके आवश्यक कर्म बसलाये । सोमदेव और पद्मनन्दिने देवपजा गुरूपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान ये पडावश्यक कर्म बतलाये ।इत सभी आचार्योने देव-पूजाको श्रावकका प्रथम आवश्यक कर्तव्य बताया है । परमात्मप्रकाश (१६८ ) में तो यहाँ तक कहा गया है कि “तुने न तो मुनिराजोंको दान हो किया, ने जिन भगवानुकी पूजा हो की न पंच परमेष्ठियोंकी नमस्कार किया, तब तुझे मोक्षका लाभ कैसे होगा 7?” इसे कथनसे महू स्पष्ट हो जाता है कि भगवानुकी पूजा श्रावककों अवदंध करनी चाहिए । भंगवान्‌ की पूजा मोक्ष-प्राप्तिका एक उपाय है ।मादि-पुराण--पर्व ३८ में पूजाके चार भेद बताये हैं--नित्यपूजा, चतुर्मुखपूजा, कह्पटुमपुजा आर अध्टाछ्लिकपूजा । अपने घरसे गन्घ, पुष्प, अक्षत ले जाकर जिनालयमें. जिनेन्द्रदेवकी पूजा करना सदार्चन अर्थात्‌ मिंत्यमह् ( पूजा ) कहलाता है। मन्दिर और मूतिका निर्माण: कराना, मुनियोंकी पूजा करना भी नित्यमह्द कहलाता है । मुकुटंबद्ध राजाओं द्वारा की गयी पूजा श्वतुर्मुख पूजा कहताती: है. 1 चक्रवर्ती हारा की. जानेत्ाली पूजा कल्पहुम पूजा होती है। और अश्टाछ्िकामें नर्दीदवर ट्वीपमें देवों हारा की .जानेवाली पूजा झष्टाख़िक .. पूजा कहलाती हैं। .''... चूजा अषद्रब्पसे को जाती है--जल, गरथ, अक्षत, पुष्य, मैमेरा, ...दौप,, चूप जौर फल, “इस पंकारक . . उल्लेख प्राय: सभी भाव ग्रन्थोंगिं मिकते हैं । तिलोगपण्णलि (वंचम: लधिकोर, साया १०४ से ११९) में भस्दी-. हवर ट्वीपमें अंछाह्िकामें. देवों. द्वारा 'मक्तिपूर्वक की जानेवाली मूलांका सर्जन है के उसमें अछवव्योंका बर्णत आग... है 1 घवला टीकामें भी. ऐसा ही वर्धन है । आतार्म: जिनसेन कृत “आविपुसाण ( पर्व, १७, दलौक २५२) मैं : , ..सरत हारा तथा पर्व २३, श्लोक १० ६ में इस्दों द्वारा भगवान पूजाके असंयसें: बहपस्सों को वर्भन




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now