अहिंसा - दर्शन | Ahinsha-darshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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्रातिस]- देन प © पद्यह्धिसा का प्रादुरभावि श्योर विकासमानव काल की श्रनेकों घाटियों को पारकर श्राज तक पहुँचा है ।इन घाटियों के पार करने में उसे अनेकों अनुभवों का लाभ मिला है ।उसे दुर्गम पथों को पार करने के लिये नये-नयेमानव की श्राय उपाय सोचने पड़े हैं; उसके समक्ष जो कठिनाइयाँमनोमूभिका श्राती गर, उनका समाधान पाने के लिये उसके| मनम सदाही एकं श्रद्म्य लालसा रही हैऔर इस लालसा ने ही उसके पथों मे परिवतंन किया है, उसकीमनोभूमि मे परिवतंन किया है | इस दृष्टि से श्राज हम यह विश्वास-पूर्वक कहने की स्थिति में हैं कि मानव काल की श्राद्य घाटी में जो था,वह्‌ श्राज नहीं है, उसमे हूत परिवतंन हो चुके है । उस समय सेश्राज उसका रूप दल गया, सचि बदल गहै, रहन-सहन श्रौर परिधानअदल गया, श्रावास शरीर संस्तरण बदल गया, श्रावश्यकताएँ तरउनकी पूर्वि के साधन बदल गये । कुल मिलाकर जीवन के मूल्य और दृष्टिकोण बदल गये ।




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