छायावाद | Chayawad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका छ समभा जाता था । इसी से करपियों की दृष्टि श्ाचारवादी १्प्सीं सदी के क्रासिकल काव्य श्रीर मराठी कविता 'तक सीमित रही । परन्तु १९वीं शताब्दी के श्रंत दोते-द्ोते देश वेँगला-काव्य से परिचित दो रददा था । माइकेज्, विदारीलाल, टेमचंद्र श्रीर रवीन्द्र दिंदी प्रदेश में भी पहुँचे । इनमें रवीन्द्र की कविता पर श्रंग्रेजी रच- च्छंदतावाद, उपनिपदों के रदस्यवाद, बं गलां मावुकता श्रीर वैप्णय भक्ति का प्रभाव था । १६१६३ के आसपास उनके क्राव्य के शनुकरण से ये प्रमाव भी दिंदी में आरा गये | परन्ठु रवीन्द्रनाथ ने श्रकेले छाया- वादी काव्य को जन्म दिया, यह कदना शत्युक्ति द्वोगी । १६०० के वाद. से ही 'सरत्वती' में कीट्स, शेजी; वर्डसवर्थ, ब्लेफ श्रादि रोमांटिक कवियों के श्रनुवाद प्रकाशित होने लगे थे । इन श्रनुवादों ने श्रनुवाद- कर्त्ताश्रों शरीर लेखकों को प्रभावित किया । दूसरे, श्रंप्रेज़ी की उद्य * कन्नाश्रों में रोमांटिक काव्य पढ़ाया जाने लगा था श्रीर नये हिन्दी के कि इससे श्रपरिचिंत नहीं रद सके । पंत द्वारा झ्रंग्रेजी रोमांटिक काव्य का प्रमाव मुख्य रूप से दिन्दी में श्राया । 'पंत” श्रीर “निराला” दोनों रवीन्द्र के क्राव्य से प्रभावित हूं । पंत” के “पह्न व” . श्रीर निराला की क्रितनी दी कब्रिताश्रों में रोन्द्र के स्वर बोल रहे हैं । निराला ने विवेकानन्द के द्रद्वैत भक्ति के काव्य से स्कूर्ति ली । प्रसाद ने रवीन्द्र की गीताझलि के प्रभाव को ग्रहण क्रिया । “भरना? की कविताएँ : इसका उदादरण हैं । परन्ठ उन्दोंने इस-प्रमाव को शीघ्र दी छोड़ दिया । उदू काव्य की व्यंजना-रीली श्रीर मावुकता एवं संस्कृत सुक्तकों एवं श्ाचार्यो' की स्थापना से इंगित लेकर उन्होंने श्रपने लिये एक विशिष्ट काव्य-शेली- का निर्माण किया ) केवल एक दशक के भीतर (१६१०-२०) हिन्दी काव्य में 'मददान्‌ क्रांति हो गई । जिन लोगों ने इसका सूत्पात किया वे बंगला या खंग्रज़ी काव्य के पंडित थे | जितनी शीघ्रता से यदद क्रांति हुई उसका उदाइरण इस देश की कविता के इतिहास में मिलना श्संभव है ।




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