आँगन के पार द्वार | Aangan Ke Par Dwar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
13 MB
कुल पष्ठ :
87
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पास अर दूर
जो पास रहे
वे ही तो सब से दूर रहे :
प्यार से बार-बार
जिन सबने उठ-उठ हाथ और झुक-झुक कर पैर गहे,
वे हो दयाछु, वत्सढ, रनेही तो
सब से कर रहे |
जो चढे गये
ठुकरा कर हृड्डी-पसली तोड़ गये |
पर जो मिट्टी
उनके पग रोष-भरे खूँदते रहे,
फिर अवह्देढा से रॉंद गये,
उस को वे ही अनजाने में नयी खाद दे गोड़ गये :
उस में वे ही एक अनोखा अंकुर रौंप गये |
-एजो चढे गये,
जो छोड़ गये,
जो जड़ें काट, मिट्टी उपाट, चुन-चुन कर डा मरोड़ गये
वे नहर खोद कर अनायास
सागर से सागर जोड़ गये ।
मिटा गये अस्तित्व,
किन्तु वे
जीवन मुझ को सौंप गये ।
चड्िहि
किन के पार हार व्
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