शेष स्मृतियाँ | Shesh Smirtiyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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र न हट न ही है कि इतिहास के शुष्क निर्जीव विधान में तेज, प्रताप श्रौर प्रभत्व व्यंजित करनेवाले ब्योरे भी छूटे रहते हैं। उनके सजीव चित्र भी दाक्तिद्याली ऐति- हासिक पुरुषों की जीवन-स्मृति में श्रपेक्षित हें। श्रा्मा हे उनकी श्रोर भी महाराजकुमार की भाव-प्रेरित कल्पना प्रवत्त होगी । शेष स्मृतियाँ' में श्रघधिकतर जीवन का भोग-पक्ष विवत हे पर यह विवति सुख-सौन्दर्य की श्रस्थिरता की भावना को विषण्णता प्रदान करती दिखाई पड़ती है। इसे हम लेखक का साध्य नहीं ठहरा सकते । संसार में सुख की भावना किस प्रकार सापेक्ष हे इसकी श्रोर उनकी दृष्टि हे । वे कहते हैं-- दुःख के बिना सुख ! नहीं, नहीं ! तब तो स्वर्ग नरक से भी श्रधिक दुःखपूर्ण हो जायगा । . . . . . . . . स्वर्ग का महत्त्व तभी हो सकता हू ।जब उसके साथ नरक भी हो । स्वर्ग के निवासी उसको देखें तथा स्वर्ग की श्रोर नरकवासियों द्वारा डाली जाने वाली तरस-भरी दृष्टि की प्यास को समभ स्ें ।”! मनुष्य के हृदय से स्वतन्त्र सुख-दुःख की, स्वरगं-नरक की, कोई सत्ता नहीं । जो सुख-दुःख को कुछ नहीं समभते, यदि वे कहीं हों भी तो समभना चाहिए कि उनके पास हुदय नहीं है ; वे दिलवाले नहीं-- स्वरगें ्रौर नरक । उनका भेद, सौन्दयं और कुरूपता, इनको तो वे ही समभ सकते हें जिनके वक्ष:स्थल में एक दिल--चाहे वह भ्रधजला, भुलसा या ट्टा हुग्रा ही क्यों न हो--धड़कता हो । उस स्वर्ग को, उस नरक को, दिलवालों ने ही तो बसाया । यह दुनिया, इसके बन्धन, सुख श्रौर दुःख . . . ....ये सब भी तो दिलदारों के ही झासरे हैं ।”' “प्रनन्त यौवन, चिर सुख तथा मस्ती इन सब का निर्माण करके दिल ने उस स्वर्ग की नींव डाली थी । परन्तु साथ ही असंतोष तथा दुःख का निर्माण भी तो दिल के ही हाथों हुआ था ।”' सुख के साथ दुःख भी लुका-छिपा लगा रहता है श्रौर कभी-न-कभी प्रकट हो कर उस सुख का श्रन्त कर देता है-- “दिलवालों के स्वर्ग में नरक का विष फैला । भ्रनन्तयौवना विषकत्या




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