भारतीय संस्कृति भाग - 1 | Bharatiy Sanskriti Bhag - 1

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Bharatiy Sanskriti Bhag - 1 by प्रभाकर माचवे - Prabhakar Maachve

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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«अवकाश वी भूमिया मे व्यवित सबन्न ही अपने स्वग वी रचना में व्यस्त है, वहाँ उसके आवाश कुसुम की वाटिवा है, एक कु जवन है! इन सेव वार्यों मे वह इतने गौरव वा शनुभव घरता है बिदृषिवम वे प्रति अवज्ञा उपेक्षा वा भाव है। आधुनिव याँगता भाषा मे उसने जिसे एक कणक्टू एवं अप्निय नाम दिया है, उसका हठ पाल के साथ वोई सम्बघ नही है और वेल को उसका वाहन कहना उसके प्रति ब्यग्य करना है । न मसावुपर घम' पुस्तक (बयाव्द 1340) जो सुदढ एवं सुब्यवस्थित छद हमारी रुमृति वी सहायता करता है अब उसकी कोई आवश्यकता नहीं । एक दिन सना वी वाणी में खेती वारी से सर्म्बा धत्त परामश को छद म ल्खा गया था। आधनिक बागला में जिस कृष्टि' दब्ट का उदभव हुआ है सना के उन समस्त कृपि मीत। या पथ्यवद्ध बहावता मे उसे अवश्य गतिशीलता प्राप्त हुई थी, वित्तु इस प्रवार वी छुष्टि के प्रचार का भार आजकल गद्य ने लिया है । छंद -पुस्तक। 'गद्यज दे निभध (बगाध्द 1341) गत्त उपेप्ठ (बगाब्द 1342) 'प्रवासी' मे एक जगह बल्चर शब्द के प्रतिशब्द या समानाथव' शब्द के रूप में शृष्टि का प्रयोग देखखर मन से सशय उभरा | एवं दिन वाँगूला के समाचार पत्र म अप्रत्याशित छण (फोड़) की तरह ही बहू शब्द दप्टि मे आया ।. उसके वाद वह बढता ही जा रहा है। यह देखकर भय होता है कि सम्रामक्ता समाचार पत्रों को बस्ती को पार बरके अभिजात अचलो की भोर फल रही है। प्रवासी पत्र में, अेंगरेजी अभिधान के इस अवदान ने संस्कृत भाषा का मुखौटा लगाकर प्रवेश क्या है। ऐसा नि संदेह असावधानी मे कारण हुआ है ।. प्रसंग के क्रम में यह कह दो कि बतमान बागूला साहित्य में अवदान दाब्द का जो प्रयोग देखते देखते व्याप्त हो गया वह सस्नृत शब्द कोश मे ढूढ़ने पर नहीं मिला । अब उस प्रासंगिक प्रसंग की ओर लौट चढ़ । तात्पय यह वि 'इष्टि' दाव्द अचानक बागला भाषा के शरीर मे वाँटे की तरहू चुभ गया है। चिकित्सा यदि सम्भव नही तो कम से कम दद वी बात तो बतानी ही पड़ेगी । वह शब्द अँगरजी शब्द के पैर वी माप से बनाया गया है । इतनी प्रगति अच्छी नहीं लगती । भाषा मे बभी कभी सयोगवश एक ही शब्द के द्वारा दो भिन्त जातीय अथ ज्ञापन बा उदाहरण मिस्ता है। अंगरेजी मे कल्चर इसी श्रेणी वा शब्द है , कितु अनुवाद के समय भी यदि वैसी ही इपणता की जाए ती फिर वह नितात ही अनुकरण की प्रवत्ति का परिचायव है । सस्कृत भाषा भें कपण कहने पर विशेष रूप से कृपिर्थिया का ही अथ उभरता है। भिनभिन उपसर्गों मे योग से मूल धातु को भित मिन्न अथ वाचक शो के रूप मे परिवर्तित किया जा स्वत है । सस्दत भाषा के नियम हो ऐसे है। उपसभ भेद के कारण एक 'कू धातु के अनेक अथ होते है जेस पवार विकार आकार। कितु उपसभग के थिना कृति शब्द का, आइति, प्रकृति या विकृति के अथ मे प्रयोग नहीं क्या जा सकता है। “उत या प्र उपसग के योग से कृप्टि गब्त को मिट्टी से मन की जोर उठा लिया जा सकता है जेंसे उत्दृघ्टि, प्ररष्टि । अंगरेजो भाषा के साथ हमारी एसी वोई लिखा पढ़ी ता नही है कि उसका उ्या का त्यां अनुवतन या नकल करके भौतिक एव मानसिक दो अ सवर्ण नर्थों का एक ही शब्द के साथ गठब धन होगा * वैदिक साहित्य मे सस्कति शब्द वा प्रयोग मिलता है उसम दित्प या कला के सम्बंध मे भी सस्कृति शब्द का प्रयाग क्या गया है। आत्मसस्कविर्वाव शिल्पानि । इस अँगरेजी मे इस प्रकार कहा जा 3 | भारतीय सस्इति




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