हिन्दी और मराठी का निर्गुण सन्त - काव्य | Hindi Aur Marathi Ka Nirgun Sant - Kavya

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Hindi Aur Marathi Ka Nirgun Sant - Kavya by प्रभाकर माचवे - Prabhakar Maachve

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतीय काव्य में अभेद रु ०७ 2602-37 ०22२ ६२२४१५०:०६०+१२ी २ सजीफरीी ३ र१-ह जी जिस फरीपट की पय प #रीतरीि_- जि हस्त परी जज परी एत *५/१० घी एज निकलो हैं, यद्यपि महाराष्ट्री ओर शौरसेनी प्राकृत में व्याकरणगत कई भिक्षताएँ हैं, फिर भी 'आइल गइल, गइली गइली' जैसे भोजपुरी मेंधिली प्रयोग मशादी म भी मिलते हैं और पहाड) बोरां तक में भरादी के कई शब्द यैले ही मिलते है, जले उडिया स। होना भापाओजं का इतिहास या कहे उत्त भारत की चारा पम्तु॒ भाषाओं जवात्‌ पेंगटा, हिन्दी, गुजराता जोर मराठी क स्राहित्य का इतिहास एक ही सी रेखा मे पिफ्सित हुआ है। जारस्भ में वही सिद्ध जोर निर्गुण सन्त, फिर ये मय भक्तिधारा, राम कृष्ण चरित पर जाश्वित का“य, फिर एक युग उत्तान ज्जार जथबा उम्र वीररस से भरी छोकग्रीव गाभयाओं के रातियद्ध कान्य का, फिर जग्नमेजें। कु जागमन के बाद एक नय ज्ञागरण का प्रस्फुरन | आयुनिक काह से भी पही प्रारम्भिक विदेशी प्रभाव कु प्रति झशजित चित्त अस्थिरता, फिर घोर जनुकरण, याद सम गानों प्रेरित राष्ट्रयता सथा ज त में साक्स-फ्रायड के व्यापक प्रभाय की छाया, पुरानी छीक छोडफर चलने की उग्पटाहट, सभा साहित्यां सम णए+ सी बूत्ति लक्षित होता है। कुछ दशर्फों का अ तर हर सा उधर छोड द--उतना प्र यैऊ प्र/न्त का सामाजिक सास्कृतिक जागृति की गति का भेद मात्र है । गोआ से गोॉंड्वाना तक नोली जानेवाला, कोकणा, जहिराणी, यण्हाडी बालियाँ से युक्त (या फॉफणी से भितर )) ढाई फरोड़ जनता फी इस भाषा का नास सराठी हैं। सराठी साहिध्य का आरम्भ ९८४ ईस्वी स माना जाता है, यद्यपि शोधरों को रुज ताम्रपट हससे भी पुराने मिके है । हिन्दी ऊ॑ आादिकपि स्वयम्सू तथा सरह का काछ सात्ीं शत्ती हे, मराठी ऊे सानभाव जअवथा महानुभाव कवियों में चक्रधर, महदृस्पा, उद्धव चिदूघन, सुकुदराज जादि का काल भरी स्यारहया बाती तक्र पहुंचता है। प्राचीन जांर मध्ययुगीन मराठी साहित्य के कालखड यों साने जाते हैं १ झनिश्वर जौर महाजुभायी सन्‍्ता का यादृवकाछ ( १२७०-१४७० ) २ एकनाथ दासोप द का परहमनीकाक ( १३५०-१६०० ) ३ रासदास तुकारास का शिवकादर ( १६००-१७०० ) ४ मोरोप त रामन्नोशी का पेशवाकांछ ( १७००-१८०० ) सन्‌ १८१८ मे पेशधाड़ के पतन के पश्चात जाधुनि्क को का आरस्भ २ हि भ०




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