साहित्य देवता | Sahity Devata

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वैद्य कहते हैं घमनियों के रक्त की दौड़ का आधार हृदय है--क्या हृदय तुम्हारे सिवा किसी और का नाम है ? व्यास का कृष्ण और वाल्मीकि का राम किसके पंखों पर चढ़कर हज़ारों वर्षो की छाती छेदते हुए आज भी लोगों के हृदयों में विराज रहे हैं ? वे चाहे काऱाज़ के बने हों, चाहे भोज-पत्रों के, वे पंख तो तुम्हारे ही थे । रूठो नही, स्याही के श्वंगार; मेरी इस स्मृति पर तो पत्थर ही पड़ गये कि-- ये तुम्हारा चित्र खींच रहा था । को के _.. ऋ मे परन्तु तुम सीधे कहाँ बेठते हो ? तुम्झरा चित्र ? बड़ी टेढी खीर है ! सिपहसालार, तुम देवत्व को मानवत्व की चुनौती हो । हृदय से छन कर, घमनियों मैं दौड़नेवाले रक्त की दौड़ हो और हो उन्माद के अतिरेक के रक्त- तपणु भी । आह, कौन नहीं जानता कि तुम कितनों ही की बंसी की घुन हो; घुन वह, जो गोकुल से उठकर विश्व पर अपनी मोहिनी का सेतु बनाये हुए है। काल की पीठ पर बना हुआ वह पुल मिटाये मिटता नही, भुलाये भूलता नहीं । ऋषियों का राग, पैगाम्बरों का पैग़ाम, अवतारों की आन युगों को चीरती किस लालटेन के सहारे हमारे पास तक आ पहुँची ? वह ता तुम हो । और आज भी कहाँ ठहर रहे हो ? सूरज और चाँद को अपने रथ के पहिये बना, सूभ के घोड़ों पर बैठे, बढ़े ही तो चले जा रहे हो प्यारे ! उस समय हमारे पु




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