भरतेश - वैभव भाग - 3, 4 | Bharatesh - Vaibhav Bhag - 3, 4

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
17 MB
कुल पष्ठ :
338
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)स्वयंवर संधि. 1 ३भरतजी सचमुचमे पुण्यशाली महात्मा हैं । क्योंकि जिनके कात्ण
से बड़े बढ़ योगियोंके दइयका भी शश्य दूर हो एवं उनको ध्यानकों
तिद्धि होकर कैवल्यकी प्राप्ति हो, उनके पुण्यातिशयका वणन क्या!
करें ! इसका एकमात्र कारण यइ है कि उन्हें माठुम है कि शत
साघनकी विधि क्या दै ? परपदार्थोंक कारणते चेचछ द्ोनेवाल जातमा
कों उन विकल्पोंते हटाने तरीका क्या हैं ? उसी अनुभवका प्रयोग
ब.हुबढिके शल्य दूर करनेमें उन्होंने किया ।इसके अछात्रा वे प्रतिनित्य व. परमात्पाकों इस रूपनें स्मरण
करते हैं कि--
हे परमात्मन् ! आप पहिढे अल्पप्रकाशरूप धमेध्यानसें
प्रकट होते हैं । चित्तक़ा नेमेल्य बटनेसे अत्याधिक उज्वछ प्रकाश
रूप शुक्ध्यानसे प्रकट होते हैं । इसलिए हे चिदंबरपुरुप ! मेरे
हृदय बने रहो
इति-श्रण्यारोहण संघि |न
अथ स्वयंवर संघि.भगवान् बाहुधलिस्त्रीमी, अनंतवीय एवं कच्छ महाकच्छ बोगि-
यॉको केवलज्ञान हुआ इससे भरतजी बहुत प्रसन्न हुए हैं । उसे स्मरण
करते हुए भानदसे अपने समयकों व्यतीत कर रहे हैं ।महाबल राजकुमार व रत्नबल राजकुमारका योग्य वयमें बहुत
वैभव+ साथ विवाह कर पितृवियोगके दुःखको मुलाया ।अपने दामाद राजकुमारोंको एवं अपनी पुत्रियोंको कभी २ बुढवां
कर उनको अनेक विपुल संपत्ति देकर भजते थे । इस पमकार बहुत
आनंद भरतजीका समय जारदा है ।
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