जैन धर्म में शासन देवतावों का स्थान | Jain Dharam Main Shasan Devtavon Ka Sathan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
164
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)लनम सभेव सथाने - ११.कोई भी तीर्थंकर या अर्हसपरभेष्टी नहीं मानता है, उस ` भावसे -
उनका कोई बादर नहीं करता है; तो - मिथ्यात्क क्यों करनहोंसकता है ? 'यहीं विषय विचार करनेका स्थल हैं ।. '
इस विषयका निषेध करनेवाले सज्जन यह गल्लत कर -लोगोमें श्रम उत्पन्न करते हैं कि' ब्ञासनदेवतावोंको माननेवाले *
इन्हे -तीर्थंकरोके समान -भानते है, तीर्थकरोके. समान उनकी ˆ
पूजन करते हैं, : उनसे . अपने .इष्टसिद्धि : आदिकी अभिलापा
करते हैं, वगेरे'वगेरे, परन्तु यह, सब निराधार है, कल्पित है
दूसरोंके ऊपर आरोप करनेके लिए साधन बनाये गये.हैं;
इसका -विस्तारसे निरूपण, हम आये इस ग्रन्थ में करंगे ।
। . उससे , पहिले यह भी विचार: करना. आवश्यक हैकि -*
स॒म्यक्त्वके प्रकरणमे फिर यह, विषय आया क्यों? निवेघ करने-
वाले इसके लिए कौनसा आधार पेश.करते हैं । इसका भी
यहांपर विचार करेंगें। ।
.. सम्यग्दर्शनकी शुद्धिसे लिए अष्टांगोंकी जैसे आवश्यकता '
बेतलांई उसीं प्रकार तीन' मूढतावोंका अभाव होना भी आव---
'इयक ` बतलाया गथी है । पतमी ` अमढदृष्टिं धंग की शुद्धि `
हो जाती है। न ® थू ५
` तीन मृढतये ये हैं, लोक मृढताः, देवमठता, ` पाथंडिमठवा `
सप्रकार है । इसमे देषमृहताको'सामने रखकरये लोग क्षासंन
देवतावोके सत्कारका निभेध. करते है, . अतः उसीपर बिच
करना यहां उपयुक्त है । ~
इन भूढतागोसे देव॑मूटकंका लक्षणा प्रन्थकारोने इस श्रकार
कि है | ¢ ` >
- धरोधलिष्यादावार् दाव षमसोमसा-॥ ` १.४
१; यवुपस्सीन देवतामूदसुच्यते ।। .केले के + 1० : > ' ' ` >> , रतकरडनात्रक्यक्पथक
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