दशरूपकम | Dasharukam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ७कामसूत्र में भी नाटकों का तथा नटों का सडेत सिलता है । इसा की दूसरी शती के बहुत पहले भारत में नाटकों का अस्तित्व न मानने वाले पाश्चात्य पण्डितों के झागे चात्स्यान के अथंशाख्र से निम्न पंक्तियाँ उपस्थित की जा सकती है:--कुद्ीलवा श्यागन्तवः प्रे्णक मेषां द्यु: । द्वितोये5हनि तेभ्यः पूजा नियत लमेरन्‌। ततो यथाश्रद्ध सेघां दान मुत्सगों वा । व्यसनोत्सवेषु चेषां पर्परस्येककायता । ( का० सू० १; ४; २८-३१ ))श्र्थात्‌ बाहर से श्राये हुए नट पहले दिन नागरिकों को नाटक दिखाकर उनका व्हराव या मेहनताना ( पूजा ) दूसरे दिन लेवें । यदि लोग देखना चाहें तो; फिर देखें नहीं तो नटों को बिदा कर दें । नगर के नटों व झागन्तुक नहीं दोनों को एक दूसरे के कष्ट तथा आनन्द में परस्पर सहयोग देना चाहिए ।इस से भी बहुत पहले पाणिनि के झ्रष्टाध्यायी सूत्रों में ही शिलाढी तथा कृशाश्च के नटसुत्रों का उल्लेख मिलता हैः--पाराशयदिलालिग्यां भिक्तु- नटसूचयो। ( ४३११० ) कमन्द्छूशाश्वादिनि। ( ४२१११ ) । इससे शिलाली तथा कृशाश्व इन दो आचार्यों के नटसुत्रों का पता चलता है । डॉ* कीथ, प्री सिलचाँ लेवी की गवाही पर इन दोनों शब्दों में व्यंग्य मान कर इन्हें किन्हीं व्याचा्यों ( नाय्याचार्यो ) का नॉम मानने से संहमत नहीं है । लेवी के मतानुसार मशिलाली” का रथ है “जिसके पास शिलाकी ही शय्या है; श्यौर कोई चीज सोने को नहीं” और 'कशाश्व' का अथें है “जिनके घोड़े दुबले-पतले हैं” । पर इस तरह का झथ निकालना कोरा मनगढ़न्त ही जान पढ़ता है । कीथ यह भी संकेत करते हैं कि 'नट” शब्द का पाणिनि में पाया जाना पुत्तछिका उत्यादि की पुष्टि कर सकता है + पाणिनि का काल वे चौथी शताब्दी इं० पू० मानते हैं तथा पाणिनि में 'नाटक' शब्द के श्रभाव को उस काल में भारतीय नाटकों के न होने का अ्रमाण मानते हैं ।* किन्तु 'नटसूत्र' शब्द चस्तुतः किन्हीं सेद्धान्तिक सूत्रों का सडेत करता है, जिसमें नं के लिए क्रिया प्रक्रिया, कला-कौशल का विवेचन किया गया होगा । अतः 'शिलाली' व 'कुशाश्व' का लेची की तरह उटपरयाँग झथे लेना, या कीथ की तरह “नाटक' शब्द या नाटक” के पर्यायवाची शब्द ही पर अड़े रहना पक्षपातशून्य नहीं नजर आता 1महाभाष्यकार पतज्ञछ्ि में तो स्पष्ट रुप से “कंसबघ” तथा “बलिबन्धन” इन दो कथाओं से सम्बद्ध नाटकों का उल्लेख है । महाभाष्यकार पृतज्ञलि का समय निश्चित . है, कि वे अभिमित्र ( शुज्चवंशी राजा ) के पुरोहित तथा शुरु थे । वे लिखते हैं कि 'कस पहले मर चुका है; इसी तरह बलि का वन्धन भी श्तीत काल में हो चुका है, किन्तु ये नट वत्तंमान काल में भी हमारी आँखें के सामने कंस को मारते हैं; तथा बलि को बॉधते हैं:--इद् तु कथे चत्तसानकालता कंस घातयति बाल बन्धयतीति१. चह--पृष्ठ ३१ ।




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