आदर्श आवेश और सत्ता | Adarsh Avesh Aur Satya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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18 मेरी तेंतीस कहानियाँ सरकार ने सुचित किया है कि भैया लापता हैं प्रौर भाभी के लिये जैसे इसका कोई ग्रर्थ हा नहीं है । न रोती हैं, न सुनती हैं । पत्थर की प्रतिमा जैसी यन्त्रवत काम में लगी रहती हैं ।” कु उसे खुब याद है कि नह फुसफूसाया था--शाथी र ई नहीं, क्यों ? क्यों नहीं रोई ? कक या कक जेंस तूफान गजे उठा । उन्नचास पवन एक साथ उमड़-घुमड़ श्राये । कई कण वह श्रालोड़िति रहा फिर स्तव्ध हो गया । वहुत चाहा कि तुरन्त भाभी को लिखे परन्तु तन दिन के प्रयत्न के बाद दो ही पंक्ति लिख सका । “मैया अवश्य लौटेंगे । जगदीदवर इतने निददेयी नहीं होंगे /' उत्तर में इतना ही पाया--मैं जानती हि नेफा में वे वीरतापुर्वक लड़, खुव लड़े, पर इतने घायल हो गए कि साथी उत समक कर छोड श्राये । डइरमन ने तो मिट्टी का तेल डाल कर श्राग थी लगा दी । लेकिन उसी श्राग से जेसे उनके प्राण लौट श्राये । होश में आने पर सबसे पहले उन्होंने जलती हुई जाकट उतार फेंकी श्र फिर धीरे-धीरे रेंगते हुए रात के अन्वकार में श्रपनी चौकी पर लौट आ्राये । भ्रोफ, उस छोटी-सी यात्रा की कहानी । मैं लिख नहीं सकूंगी । रोमांच हो उठता है,” अब वह सैनिक श्रस्पताल में हैं। हम सब वहाँ गए थे। भाभी वहीं पर है । भैया की भ्रवस्था' वहुत श्रच्छी नहीं है । शत की गोली ने नाक का कुछ भाग काट दिया है। प्लास्टिक सर्जरी हुई है। सुनती हू एक हाथ श्रौर एक पैर भी काट देने की वात है ।' थे .. वे लौट श्राये यही क्या कम वात है. परन्तु जानते हो, भाभी ने जब भैया हा के जीवित होने का समाचार सुना तो नह संज्ञाहीन हो गईं थीं। कई घंटे वाद प्राँख खोल सकीं | नहीं जानती थी कि हर्ष भी इतना घातक होता है। वात वात में रो उठती हैं । लेकिन भैया के सामने वरावर हंसती रही । ाँसुग्ों की धार के पीछे उनकी हँसी नहीं रकती 1 'सनिकों के लिये श्रौर उनके परिवारों के लिये उन्होंने जितना कुछ या है उसका लेखा-जोखा मेरे वश का नहीं है। प्रभी-श्रभी लौटी हूँ । योंकि होली फिर श्राने वाली है । उनका श्रात्रह है कि सदा की भाँति इस




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