शब्दों का विष | Shabdon Ka Vish

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चलने देता ! सिर भ्रुककर उनवी सारी फिडक्यो को पानी की तरह गटागट पीता चला जाता है ।परतु श्राज वी स्थिति भिन्न है। घर से ही वह विलम्स से निकला है श्रत वह बडे साहव के वगते पर भी जा नहीं पाया । आज दोनो अफसर एक साथ श्राग्य नेत्रा से घूरेंगे । म्रफसोस तो इस बात का है कि यह उनका विस तरह सामना मरेगा ?सच तो यह है कि दादी के सर-दर्द ने उसकी ऐसी तैसी करदी, नहीं तोवह भी मस्तक ऊ चा चरके दफ्तर मे प्रवेश वरता । उस म्रसाम- थिक घटना पर बुढने से भी कया । यद्यपि उसकी मानसिंग' स्थिति ब्रना- वयक रुप से झ्स्त-व्यस्त है, तथापि यह साधारण सी वात वह भली- भाति समकता है । इसके साथ वह उसके निराकरण का उपाय भी मन ही मन सीच रहा है। उसकी गम्भीर मुद्रा स ऐसा ही सात हुमा ।इतना ही गही वि एक ठण्डी झाह भरने के भ्रतिरिक्त उसके पास कोई दूसरा विवस्प नही है ।चाहे गर्मी की चिलबिलाती धूप हो भ्रथवा शीत वी सुहावन मोठो धूप फिर भी इससे कोई भ्र तर नहीं पड़ता । छत पर खड़ी रह बार दादी जब्र तक दो चार घरों मे ताक काक नहीं कर लेती, उसका कलेजा ठण्डा नहीं हो पाता । उसकी श्र वेयक दृष्टि पत्थर की छ्तो श्रौर ईटा वी दीवारों तर्क को भेद डालतो है । कोई श्रपरिचित घटना, कसी तरह की ग्रनहोनी बात या कोई श्रसाघारण प्रसंग इसके कानों श्रौर झ्राँखो से छिप नहीं पाते । कानों मे पड़ी बात को एवं दृश्य के रूप में प्र यक्ष देखन की इसकी लालसा बनी रहती है । प्रपनी उत्कण्ठा शातत करने के ग्रमिप्राय से वह श्राधी आधी रात तब छत पर बेचैनी सै दहलती रहती है 1 न जाने कैसी बेकली है ! 7दादी / १४




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