सन्त - वाणी | Sant - Vani

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
186
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शेरसन्ननवाणीशेड .
सात सरग असमान पर, भटकत है मन मूड;
खालिक सो खोया नहीं, इसी महख में झड़ ।
[ गर्रीबदास
१३
शक संप्रदा, सबद घट, एक ट्वार सुख-संच;इक आत्मा सब सेष मों, दूजो जग-परपंच ।
[ भीखाश्चे
अब हों कासों बेर करों ?
कस पुकारि प्रभू निज मुख ते--
“बट-घट हो दिहरों ।”
[ इरिदासशद
का रे, बन खोजन लाई
सवंनिवासी सदा झलेपा,
लोदी संग समाई ।
पुष्य-मध्य ज्यों बास बसत दे,
झुकुर-मध्य ज्यों थाई;
वैसे ही हरि बसे निरन्सर,
घट ही खोजो भाई !
[. नानक
श्द
गनइमार अपराणी तेरे, भाजि कहां इम जाहिं;
दावू” देकला सोचि सब, तुम विन कहिं न समाहिं।
[. दादूदयात
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