हिमर्शल | Himarshal
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
140
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)हिमर्शलतंदुल ने धीरे से कहा--सम्नाट ! पृथ्वी ग्रह की अब दिशेषता यह
है कि वहाँ कोई सत्य नही वोलता । एक-दूसरे पर कोई विश्वास नहीं
करता । सम्बन्ध इसलिए चलते रहते हैं कि उनसे किसी को कोई लगाव
नहीं है। वहाँ किसी झाँख में श्रपनापन नही है । किसी मन में प्यार
नहीं है 1नातंदुल ! ये--ये क्या कह रहे हो? क्या कह रहे हो तुम ?
क्या ऐसा भी कोई ग्रह हमारी आकाश गंगा में है? नही, हम यह नहीं
मान सकते । सम्राट ने सिंहासन से उठते हुये कहा ।तंदुल भी उठते हुए वोला--इसीलिये, सम्राट ! मैं कुछ कहना
नहीं चाहता था । यदि पृथ्वी ग्रह पर थी में यह कहता तो कोई विश्वास
नेहीं करता । सच को कोई सुनना, समभना या मानना मही चाहता ।
सब एक भुलावे श्रौर दिखावे की जिन्दगी जी रहे हैं, सम्राट !जातुम सच कह रहे हो, तंदुल-भ्रापके प्यार का मैं भू ठ वोलकर तिरस्कार नहीं कर सकता ।
मै पृथ्वी ग्रह का निवासी अवश्य हूँ किन्तु सम्य मानव के ससार से सदा
देर रहा हूँ, इसलिए मुक्ते उनके प्रगतिशील सस्कारो की धरोहर नहीं
मिली ।--मुके तो श्रमी भी विश्वास नही हो रहा है । सम्राट ने तंदुल के
के पर हाथ रखते हुए कहा !--प्राप सच कह रहे है, सम्राट ! ऐसे श्रविश्वासी ग्रह की कल्पना
भला कौन कर सकता है किन्तु यह सत्य है, परम सत्य 1 मेरे प्रथ्वी ग्रह पर
धघरती विभिन्न मुल्कों के नाम से जानी जाती है । पानी शरीर पहाड़ों ने उन
सुल्कों की सीमा बना दी है ! जहाँ ऐसी कोई सीमा नही है वहाँ वजर
जमीन के लिए एक-दूसरे देश के सिपाहियों का खुन बहाने में उन्हे
प्रसश्नता का अनुभव होता है। जहाँ सीमा है, वहाँ उसका विस्तार करना
चाहते है वे लोग । कोई मुल्क, किसी मुल्क से सच नहीं वोलता । कोई
देश, दूसरे देश की प्रगति नहीं चाहता ! पड़ोसी, पड़ोसी के सुख से जलता
है । देश, देश की प्रगति से कुढता है ।तंदुल भावावेश में वोले जा रहा था कि सम्राट ने यीच में टोकते
हुए कहा-बस, तंदुल ! बस । हम ऐसे ग्रह के बारे में जानना भी पाप
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