जैन दर्शन और संस्कृति | jain Darshan Aur Sanskriti

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
jain Darshan Aur Sanskriti  by आचार्य महाप्रज्ञ - Acharya Mahapragya

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about आचार्य महाप्रज्ञ - Acharya Mahapragya

Add Infomation AboutAcharya Mahapragya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
दशेन है सत्यं शिव सुन्दर की त्रिवेणी डे २ व्यावहारिक (138008110] या नैतिक (एए0181) ३ आध्यात्मिक ([5छ1111031), घार्मिक (८1005) या पारमार्थिक (प्रश्घ5एटाएऐंटए 81) इन तीन दुष्टियो से “सत्य', 'शिव' ओर 'सुन्दर' का मूल्याकन किया जा सकता है । बस्तुमात्र जय है और अस्तित्व की दृष्टि से ज्ञेयमात्र सत्य है । पार- माथिक दृष्टि से आत्मा की अनुभूति ही सत्य है । शिव का अथथे है--कल्याण । पारमाधिक दुष्टि से आत्म-विकास शिव है। व्यावहारिक दृष्टि से भौतिक (पौदमलिक) साज-सऊ्जा सौन्दयें है । सौन्दर्य की कल्पना दृष्य वस्तु मे होती है । दृश्य वस्तु रूप, गन्ध, रस और स्पर्श--इन चार गुणों से युक्त होती है । ये वर्ण आदि चार गुण किसी वस्तु में मनोश (मनपसद) रूप मे होते हैं, तो किसी मे अमनोज्ञ । इनके आधार पर वस्तु सुन्दर या असुन्दर मानी जाती है । पारमार्धिक दृष्टि से आत्मा ही सुन्दर है । पारम। थिक दृष्टि से सत्य, शिव और सुन्दर आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी नही है । व्यावहारिक दृष्टि से एक व्यक्ति सुन्दर नहीं होता, कितु आत्म विकास-प्राप्त होने के कारण यह शिव होता है । इसके विपरीत जो शिव नहीं हौता, वह कदाचित्‌ व्यावहारिक दुष्टि से सुन्दर हो सकता है । मूल्य-निर्णय की उपयुक्त तीनो दृष्टिया स्थूल नियम हैं । व्यापक दृष्टि से व्यक्तियो की जितनी अपेक्षाए होती हैं, उतनी ही मुल्याकन की दुष्टिया हैं । कहा भी है-- गन रम्य नाइरम्य प्रकृतिगुणतों वस्तु किमपि, प्रियत्व॒ बस्तुनां भवति च खखु ग्राहकबशात्‌ ।”” प्रियत्व और अभ्रियत्व ग्राहक की इच्छा के अधीन हैं, वस्तु मे नही । निश्चय-दृष्टि से न कोई वस्तु इष्ट है और न कोई अनिष्ट । “तानेवार्थान द्विवित , तानेवार्थान प्रलोयमानस्य । निदचयतो5त्पानिष्ट, न विद्यते किचिदिष्ट वा ।”” -एएक व्यक्ति एक समय जिस वस्तु से दष करता है, वही दूसरे समय उसी मे लीन हो जाता है, इसलिए इष्ट-अनिष्ट किसे माना जाए ? व्यवहार की दारिट में भोग-विलास जीवन का मूल्य है । अध्यात्म की दृष्टि मे काम-भोग दुख है । सौन्दर्य -असौन्दयं, अच्छाई-बुराई, प्रियता-अप्रियता, उपादेयता-हेयता आदि के निर्णय मे वस्तु की योग्यता निमित्त बनती है । वस्तु के शुभ-अशुभ्न परमाणु मन के परमाणुओ को प्रभावित करते हैं । जिस व्यक्ति के शारीरिक




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now