श्री जैन - हित - शिक्षा भाग - 1 | Shri Jain Hit Shiksha Bhag-1
श्रेणी : धार्मिक / Religious

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
262
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)(७)
वर जन बह तारिया ॥ तिमिर चरण जग साख ॥
सु० ॥ २ फटिक सिंहासण जिनजो फावता ) तर
शोक उदार ॥ छत चामर सामउल' भलकतो ॥|
सुर दु'्दमि /ल्तिंगकार ॥ सु० ॥ ३८) पुष्प पुष्टि वर
सुर प्पनि दौपती ॥/ साहिब « लग शियगार ॥ अस्त
जान दर्शन सुख वल घग 0 ए/दाद्स गुण श्रौकार |
सु ॥8॥ बागी/असी सम/ उपशम , रस भरी! दुर्गति
सूख कषाय । शिव .. सुखना अरि, शब्दाढ़िक, कच्मा !
लग . तारक लिन राय, सु ॥ ५ ॥ अ'तरजामीरे
शरगें आपरे ॥ हूं आयो 'अवधार ॥ लाप - तुमारोरे
निश दिन , संभरू' ० ॥ शरगागत सुखकार, ॥॥सु०॥६॥
संवत उगगीसेरे सुद्ी'पक्न भाट़वे ॥ बारस सगलवार
सुमलिलिनेश्वर तन मनस्यूं रटया ्ानन्ट उपनों
हक
अपार | सु० | ७ ॥ ः कं;
श्टन पूल स्ताकल 1
(-जिन्दविरी देशी छे खुणभगते भगयन्तसे पुदेशी )
नि्ेष पढ़ा जिसा प्रसु। पढ़ा प्रसु पिछाणर, संयस
लौघो लि से ॥। पाया चोघो नाण ॥ “पद्म प्रमु नित्य
समरिये ॥ १॥ ए अआकगी ॥ +ध्यान शुक् प्रमु
ध्यायनें ॥ पाया कंबल सोय र दौन दयाल तगी
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