अपने को समझें भाग - 3 | Apane Ko Samajhen Bhag - 3

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पशु भी लज्जित होते हैं वे पापाचारी मनुष्य अपनी पहले की सचित पुण्यवानी को खा रहे हैं- यही समझिये | वर्तमान जीवन मे वे कोई पुण्यवानी नददी बाघ रहे हैं तो इसके बाद किस योनि में पहुँचेंगे- इसका अनुमान आसानी से हो सकता है कि वह नरक योनि होगी या पशु योनि । आन्तरिक शक्ति एव शान्ति के अमाव मे मनुष्य जीवन की ऐसी ही दुर्गति अवश्यमावी होती है। फिर भी जनसख्या क्यो बढ रही है ? शास्त्रीय समाधान फिर भी जनसख्या इतनी अधिक किस कारण बढ रही है- यह प्रश्न तो रह ही जाता है। इसके समाघान में शास्त्रीय दृष्टि से चिन्तन करेंगे तो मनुष्य योनि में आने के चार साधन- चार खदानें हैं। इनमें से मानव की स्थिति निर्मित होकर आ रही है । ये चार साधन कौन से हैं ? पहला साघन है नरक । आज के क्रूर कर्मी मनुष्य अगले जन्म मे नरक में जाते हैं। लेकिन नरक में रहने वाली आत्माएँ शुम पुण्यवानी का संचय करके पुन तिरछे लोक में आती हैं। जिन आत्माओं को नरक में जाने के बाद वहाँ की 'यातनाएँ सहने के कारण विगत मे अपने किये हुए पापों का मान हो जाता है तो फिर वे अपने आपको सुधारने का प्रयत्न करती हैं। जैसा कि यहाँ पर भी कई अपराधी जेल में अपना सुधार कर लेते हैं। पश्चाताप के प्रमाव से ऐसा सुधार हो सकता है। पश्चाताप से पहले के पाप कर्म छूटते हैं तो नवीन शुभ कर्म बघते हैं। वह पुण्य कर्मों का उपार्जन नरक की अवधि समाप्त होने के बाद मनुष्य जीवन में इस आत्मा को पहुँचा सकता है। दूसरा साधन पशु योनि का है। पशु योनि में आने वाले कई पशु दुनिया की बहुत सेवा करते हैं। गायों और बैलों को ही ले लीजिये। उनको खाने के लिये घास आदि तुच्छ पदार्थ देते हैं लेकिन ईमानदारी से गाएँ दूघ देती हैं तो वैल खेती का परिश्रमी काम करते हैं । इस निश्छल सेवा से उनको पुण्यवानी का सचय होता है और मनुष्य योनि में आने का अवसर मिलता है। तीसरी खदान देव योनि की है| स्वर्ग में देव दिव्य सुख का अनुमव करते हैं और जब उनकी पुण्यवानी खर्च हो जाती है तो वे फिर लौटकर मनुष्य योनि मे आते हैं। वहों भी नई पुण्यवानी वाघ सकते हैं और मनुष्य योनि में जन्म ले सकते हैं। इस स्थिति का सही अनुमव थली प्रदेश के लोग ले सकते हैं। जैसे वे कमाने के लिये परदेश जाते हैं और घनोपार्जन करके यहाँ मकान आदि की सुख सुविधाएँ मोगते हैं। जब घन यूट जाता है तो फिर परदेश चले जाते हैं। जन अपनेको.




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