सांख्य योग दर्शन | Sankhya Yog Darsan

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Book Image : सांख्य योग दर्शन  - Sankhya Yog Darsan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रूख्य-पोग-दर्शन | [ ६ सृदमर चस्य को जानने में असमर्थ रहती है और उसे ही त्रास मानकर उसका पर हान प्राप्त कमनी हे । पश्चात. जन के क्रमिक विकास से उस पृ को ब्यास से व्यय इसे उन्तोय मही मिलना, उसमे उतना झानन्द नही मिलता जितना श्र उये दूरी वस्तु मे मिलता हे। इसालए अब व श्यानन्द को हू दता हुद्ा दूसरा बन्द ने प्रधि आन पाता हैं शोर उसे ही श्रामः माकर उतष्ा पं ज्ञान प्रप्त करने लगना है} रदी सोपान परम्पर। से “श्रात्म” को हू ढता हुश्ना जिश्ापु अपश. भौतिक जगत्‌, पराङवि$ जगत्‌, मापि जगत्‌ एव चिन्न जगत्‌ मै विचस्ण करता हा एपितरी च्चादि भोतिक पदार्थो क स, रजस्‌ श्रौर तमस्‌ के स्प म॑ देर, पश्चात्‌ इ~ तीन यणा क विशुद्ध कसय प्रधान निर्वचनीव मावा केर में पाकर, क्रमश पश्चात इन्हें ही चि्मय रुप ए दैतकर्‌, प्रर ॐ दूर ह्य जाने पर ग्रपन शरीरगः ही श्रन्दर षतमा पर्ण्मिन्नं चेतः फो प्रप्तकर प्रत्‌ द्रयप्रौरिद््द के मेद के दूर हा जा पर शद नड भ सादात्‌ ठुमके १२१। इतरा श्रत्ठ >े ह चेष षो मी हप्र एक्मेवाद्धितीय नेद्‌ नान.ऽप्त फिन्नन, तथा श्स्व यद्‌ नदाः म बदच्रस्ने को भी विलीन कर देता है । फिर कहाँ दे स्ँत' छार जय 'द्रे' नहा तब 'ददेत री कहां । इडीं.लेए उपनिपद ने तडा -त। वाचो निवर्ते पराप्य म॒ना सह! दोर याल वत्व वहा--भनिनातारमरे केन रिजानीयादिति” 1. यहीं पर्यत्थ की प्राप्ति होती हे । यही श्रलरडदोघ होता हे । यट्टी श्राजाका साश्ात्क र रोता | यहीं दुःख से सदा के लिए मुश्ति मिलती है शौर यहु एण श्नानन्द स सुदत्र हेता है १९क वार्‌ इत स्वरस्य को पाकर पुनः लौडकर जीव रुखार में नहीं श्ादा । वहीं “दर्शनों है खपयु बन बातों से यह स्पाट हे कि रुभी दर्शन एक दी द्देस ये अर तू दुन्व बी चरमनिदत्ति या परमातन्द की पाप्ति के जिए शर्त होते ह तएव सभी नियत एक ही मायं के पथिकं हैं | प्रत्येक दर्शन इसी 'दर्शन-यात्' में मिन्र-मिनन विभाम-रस्थान है| प्रत्येक रिध्म-स्पान




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