दाँवपेंच | Danvapench

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Danvapench by ललित कुमार - Lalit Kumar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दॉव-पेंच ~ [ कहानी पहचान की नींव पृड़ी । दीप ने वताया, वह नया-नया रियासतं का वकील होकर श्राया हे । युवततौ--राजङकमारी ने अपना चास्त- विक परिचय न देकर कदा- (मै रानीजी की खस सहेली हूँ । और टमटम से उत्तर पडी) दीप ने भी साइकिल को एक वृत्त के सहारे खगा चिया। «फिर दोनों पाम के एक प्राचीन खंडहर मे चले माए । क्षण भर कोइ छुड न बोला | दीप ने मौनता भंग की-- “क्या रानी जी अपने कमेचारियों को कभी दशन नहीं देती ?? दिती दः युवती ने उत्तर दिया 'कितु यह दीवान जी की सजीं पर हे # दीप--'दीवान की मर्जी पर अपने कर्मचारियों को दर्शन देती हैं । तब तो अच्छा शासन चलाती है ॥ युवती--( मुस्कुराकर ) स्या इसमे ङं असुविधा हे ¢ दीप--शुविधा-असुविधा की वात तो मै नदीं वत्ता सक्ता । मामूली कमेचारी हू--तिस पर नया, क्या जानू ¶ हो» आपसे एक निवेदन हे । युवती -- किये । दीप-- क्या आपके दर्शन कभी-कभी हो सकते हैं १ इसमें ता दीवानी की मजी की जरूरत नदीं हे १ युवती--ष्दीवानजी की मजीं की, यदो हर काममे जरूरत हे वकील साद । खोर, सै चेष्ठा करहगी ४ १९




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