रेखाएँ बोल उठीं | Rekhaen Bol Uthin

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
192
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)आमुख
एर बार एक कहानी -लेखक ने बताया था कि वह जब भी कोई नई
कहानी लिखने बेठता है तो नई कमीज़ श्रौर नया पाजामा
पहनना पसन्द करता है । कोई उसके लिए पाप पढ़ी छोटी तिपाई पर
खाय रख जाय । वस, इतने से ही उसे प्रेरणा मिल जाती है श्रौर कई
बार तो उसकी लेखनी इतने वेग से चलती है कि वह यह भी भूल
जाता हे कि चाय कब श्राई । यह बात कहानी-लेखक के लिए जितनी
सत्य है, उससे कहीं श्रधिक एक निवन्धकार के लिए भी सत्य है,
षर्योकि न तो सदा एक श्रच्छी कहानी का निर्माण हो सकता है श्रौर
न किसी भी समय बेढकर श्रच्छा निबन्ध लिखा जा सकता है । सृजन
कै क्षण हमेशा नहीं श्राते । इनकी बाट जोहनी पडती है, श्रौर जव ये
षण श्राते है तो बता कर नहीं श्राते । हाँ, क्या बुरा हे यदि लेखक
इनकी प्रतीक्षा में नई कमीज़ श्रौर लया पाजामा पहन कर बेठ जाय ।
इतना तो स्पष्ट है कि कोई भी चीज़ लिखने बेठने से पूर्व उसकी
पृष्ठभूमि का पूरा मनन होना आवश्यक है । श्रध्ययन के बिना तो ग्र
बात नहीं बनती । जिस भी विषय पर लेखनी उठ उसके चतुर्दिक
लेखक की श्राँख घूम जाय, श्र उसके मन के वातायन खुले रहें जिससे बाहर
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