जिज्ञासा नंबर एक | Jigyasa Nambar 1

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Jigyasa Nambar 1 by राधास्वामी ट्रस्ट - Radhaswami Trust

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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के . . सुसीबत या ज़रूरत के वक्त मदद हासिल करने की रज से थोड़ी बहुत परमार्थी कारंवाई करते हें । पर-. माथे में ऐसे जीवों का दरजा नहसी का हे । बाज़ों का यह हाल है कि परमा्थ की चाह तो रखते है सगर श्रो्धी । उस चाह की वजह से अक्सर भवहवी किताबों का सुताला घोर धार्मिक विषयों पर बात चीत करते हैं श्नौर जव कभी वह चाह जोर परश्राती है तो खव वहस सुबाहसा लिखकर या बोलकर करते हैं और उसी में तृप्त रहते हैं । इस क़िस्म के जीवों को श्रगर बहसी कहा जावे तो वेजा न होगा । तीसरी किस्म के लोगों का यह हाल है कि उनके दिल में सच्ची चाह परमार्थ की होती है मगर कमजोर । उस चाह की वजह से जव तब परमार्थं च परमाधिर्या की क्रद्र करते है, साधु फ़कीरों से मिलते हैं, टेक के तोर पर थोड़ा बहूत पाट पूजा करते है, दान पुर क्रते हैँ श्रोर इसी को कारी समभकते हैं घोर कोई खास जतन व कोशिश परमाथ प्रौर इसकी कमाई की रीति समक्ने भौर सममकर कमाने की ग़रज़ से नहीं करते अलवत्ता दूसरे परमाधियों का हाल पढ़ सुन कर कभी कभी इरादा करते हैं मगर रहते जहाँ के तहाँ ही हैं। ऐसे जीवों को परमसाथ में क़सदी कहा जा सकता है। चौथे वे लोग हैं जिन के भीतर परमाथ का तेच शौक्र मोजूद है और जिन्हों क




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