केसरिया पगड़ी | Kesariya Pagadee

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Book Image : केसरिया पगड़ी  - Kesariya Pagadee
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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म ण भ अं --4 १ (४फिर थी हमें यद्ध भली माति तमम लेना चाहिए कि उप परे विवाह करना सदा पानक तैमा । नमगी- ताना प्रदेस सय मान-मम्मान गार उचा ओटृदा य सय दमीलिण > छितर त्मा सगर्ित शक्ति के सम जे अपने को निवत मनना है7 सम्क्षना है । एर साल चलते के पह हे व नीता“मुझे उगने काबुल के 'यमरद नामक थाने पर लिये किया है । मुझे सपरिवार वहा जाना है । थे सिफ युपसाज प्रीतिर्‌ गो यहा पर छोड़ कर जाऊंगा । तिन दुर्गायास जी, ट्म सर उष विस्मृत करना चाहिए कि ग्रीगमजेय हमसे प्रतिलोय तले तेगा? वह्‌ मिनान्त वहुरपिया है । उसके हृदय में समरत हिन्दू जाति हे प्रति उग्या है । वह उस जाति के गौरव को समूल मिटाना चाहता है ।''महाराणा चितातुर हो गये । वे स्वय मे विन्पृत से कालीय श्राच्यत् फर्षे पर चहन कदमी करने लगे । दुर्गादा राटोद उनके चिता- तुर झ्रानन को देख रहे थे 1 देखते-देखते वे भी बोले, “ग्राप निश्चित रहिए । में भी श्रापके संग जमरूद के थाने चजुगा ।“वहा मैं अपने चुने हुए योद्धा को भी साय रउू गा । यह मैंने पहले से ही निश्चय कर लिया है ।”'“फिर कब प्रस्थान किया जावेगा ?”शीघ्र ही 1दुर्गादास ने महाराजा से आजा ली ।अपनी हवेली में श्राकर वे श्रात से पलग पर पउ गये । सोचने लगे-- महाराज उसका कितना श्रादर करते है। उसकी बातत का कितना वध्वाम्‌ करते है। उसे बितना वीर गौर स्वामी भदत मानते है। सीर एक ये उसके पिता




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