केसरिया पगड़ी | Kesariya Pagadee

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Kesariya Pagadee by यादवेन्द्र शर्मा ' चन्द्र ' - Yadvendra Sharma 'Chandra'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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म ण भ अं --4 १ (४ फिर थी हमें यद्ध भली माति तमम लेना चाहिए कि उप परे विवाह करना सदा पानक तैमा । नमगी- ताना प्रदेस सय मान-मम्मान गार उचा ओटृदा य सय दमीलिण > छितर त्मा सगर्ित शक्ति के सम जे अपने को निवत मनना है 7 सम्क्षना है । एर साल चलते के पह हे व नीता “मुझे उगने काबुल के 'यमरद नामक थाने पर लिये किया है । मुझे सपरिवार वहा जाना है । थे सिफ युपसाज प्रीतिर्‌ गो यहा पर छोड़ कर जाऊंगा । तिन दुर्गायास जी, ट्म सर उष विस्मृत करना चाहिए कि ग्रीगमजेय हमसे प्रतिलोय तले तेगा? वह्‌ मिनान्त वहुरपिया है । उसके हृदय में समरत हिन्दू जाति हे प्रति उग्या है । वह उस जाति के गौरव को समूल मिटाना चाहता है ।'' महाराणा चितातुर हो गये । वे स्वय मे विन्पृत से कालीय श्राच्यत् फर्षे पर चहन कदमी करने लगे । दुर्गादा राटोद उनके चिता- तुर झ्रानन को देख रहे थे 1 देखते-देखते वे भी बोले, “ग्राप निश्चित रहिए । में भी श्रापके संग जमरूद के थाने चजुगा । “वहा मैं अपने चुने हुए योद्धा को भी साय रउू गा । यह मैंने पहले से ही निश्चय कर लिया है ।”' “फिर कब प्रस्थान किया जावेगा ?” शीघ्र ही 1 दुर्गादास ने महाराजा से आजा ली । अपनी हवेली में श्राकर वे श्रात से पलग पर पउ गये । सोचने लगे-- महाराज उसका कितना श्रादर करते है। उसकी बातत का कितना वध्वाम्‌ करते है। उसे बितना वीर गौर स्वामी भदत मानते है। सीर एक ये उसके पिता




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