शेर - ओ - सुखन पार्ट ५ | Sher Aur Sukhan Part -v

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Sher Aur Sukhan Part -v by लक्ष्मीचंद्र जैन - Lakshmichandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दु्-शायरीपरः भ्रग्रेजी-साहित्यका बहुत श्रघिक प्रभाव पडा । श्रग्रेजीके' प्रसारसे पुर्वे उर्दू-शायरीका एक मात्र माध्यम फारसी-लायरो था । उसका श्ननुकरणं एव पुराने विचारोकी' पुनरा- वृत्ति करते रहना ही तत्कालीन उर्दू-रायरोका एक मात्र लक्ष्य रह गया था । गज़लका क्षेत्र सीमित था । इस सीसित क्षेत्रमे कोई कहाँतक उड़ान भरता ? “'गालिव ने गज़लमे पहले-पहल परिवत्तंन एवं परिवद्धन किया श्रौर इसमें उन्हें बहुत अधिक सफलता प्राप्त हुई । उन्होने अपनी तीक्षण वुद्धि श्र प्रतिभासे भ्रनेक मौलिक विचारोका गजलमे इस कौरालसे समावेज किया कि गजल नये भ्रावो-तावके साथ चमकने लगी श्रौर भ्रव वह केवल मानसिक श्रभि- रुचिको तप्त करनेके वजाय जीवनोपयोगी भी होने लगीं । गालिवकी इस सुभ-वृक्रसे शायरोको एक नवीन दिशाका ज्ञान हुमा श्र गजलका क्षेत्र भी पहलेकी श्रपेक्षा काफी विस्तृत हुमा, किन्तु गालिवकी प्रतिभाके लिए तो असीमित क्षेत्रकी ्रावस्यकता थी । स्वय श्रकेले वे कहाँ तक इस क्षेत्रको विस्तृत करते रहते ? लाचार उन्हे कहना पडा-- चायरीमें परिवर्तनके कारण कुछ और चाहिए बुसञृत मेरे बके लए यही वुसग्रत (विस्तीर्णता) उर्दू-शायरीको भ्रग्रजी-साहित्यसे प्राप्तं हुई । श्रग्रेजी कविताये प्रेमके भ्रतिरिक्त--राजनंतिक, सामाजिक, श्राथिक, व्यावहारिकः, दार्शनिक, भ्राध्यात्मिक, प्राकृतिक, राष्ट्रिय झ्रादि अनेक जीवनोपयोगी एवं सासयिक विचारोसे झ्रोत-प्रोत होती थी । विर्वकी मुख्य-मुख्य घटनाश्रोको बहुत सुरुचिपूर्ण ढगसे भ्रग्रेज़ी कविताओं हारा व्यक्त किया जाता था । अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे भारतीय शायरोंपर इन कविताओंका बहुत श्रघिक




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