भगवद्गीता में मनुष्य का स्वरुप | Shri Madbhagwatgita Me Manusya Ka Swarupa

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Shri Madbhagwatgita Me Manusya Ka Swarupa  by श्रुति सिंह - shruti Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर्शन मे है। इसका स्वरूप ज्ञानस्वरूप नहीं है, अपितु आनदस्वरूप भी है। जीवात्माओ का परमरूप मे पृथकत्व गीता को अभिमत नहीं है। यह एक “उत्तम पुरुष या पुरुषोत्तम” तथा सर्वोपरि आत्मा के अस्तित्व मे विश्वास करती है तो भी जीवात्मा का स्वरूप और उसका प्रकृति के साथ सम्बन्ध, जैसा कि भगवदगीता मे दिया गया हे, साख्य दर्शन के प्रभाव को दर्शाता हे ˆ पुरुष केवल एक दर्शक या साक्षी है किन्तु कर्ता नहीं है। प्रकृति ही सब कुछ करती है। जो यह सोचता है कि “मैं करता हूँ” वह भ्रम मे है। पुरुष ओर प्रकृति अथवा आत्मा तथा प्रकृति के परस्पर पार्थक्य को अनुभव कर लेना मनुष्य जन्म का लक्ष्य है। गुणो का सिद्धान्त स्वीकार किया गया है। देवताओं के अन्दर भी इस पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग मे ठेसा कोई नहीं है जो प्रकृति के तीन गुणो, अर्थात्‌ सत्‌, रजम्‌ ओर तमस्‌, से स्वतन्त्र हो ये गुण एक त्रिगुणात्मक बन्धन है ओर जब तक हम इनके आधीन रहेंगे, हरमे जन्म जन्मान्तर के चक्र मे निरन्तर भ्रमण करते रहना पडेगा । मोक्ष तीनो गुणों से छुटकारा पाने का नाम है। गीता का उपदेश गीता का उपदेश है जीवन की समस्याओं को हल करना ओर न्यायोचित आचरण को प्रेरणा देना। प्रत्यक्ष रूप से ये एक नैतिक ग्रन्थ है, एक योग शास्त्र है। गीता का निर्माण एक नैतिक धर्म के युग में हुआ था। गीता मेँ योग शब्द का व्यवहार किसी भी प्रकरणानुकूल अर्थो में क्यो न हुआ हो, यह समस्त ग्रन्थ में आदि से अन्त तक अपने कर्मपरक निदेश को स्थिर रखता है / योग ईश्वर के पास पहुंचने की एक ऐसी शक्ति है जो विश्व पर शासन करती हे, सम्बध जोडने ओर परमसत्ता को स्पशं करने का नाम हे। यह न केवल आत्मा की विशेष शक्ति को अपितु हृदय, मन एव इच्छा की समस्त शवितियो को ईश्वर के आधीन कर देती हे। इस प्रकार से योग उस अनुशासन (अथवा आत्मनियन््रण) का नाम है जिसके द्वारा हम ससार के आघातों को सहन करके अपने को अभ्यस्त बना देते हैं। योग एक एसा साधन है जिसके दवारा लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। पातञ्जलि का योग आत्मिक नियन्त्रण 74, 13 20, ओर भी देखो वेदान्त सूत्र, 2, 1, 1 ओर उन पर शाकर भाष्य । साख्यकारिका, 62, भगवद्गीता, 13 34 । 18 40, 14 5 योरक्रियात्मक अभ्यास ह ओर साख्य या ज्ञान से भिन्न है। श्वेताश्वतर उप०, ^पाख्ययोगादिगभ्यम्‌ ज्ञान, अभ्यास के द्वारा जानने योग्य। योग का अर्थ कर्म है । गीता, 3 7, 51, 2, 928, 13 24 भगवान ने योग को उसकी अदभुत शक्ति कहा 19 5, 10, 7 11.8 जो पदार्थ हमारे पास नहीं है वह योग द्वारा प्रात हयो जाते है। 9 22 । न € 49 =




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