जैन ज्योति एतिहासिक व्यक्तिकोश | Jain Jyoti Etihasik Vyaktikosh

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Jain Jyoti Etihasik Vyaktikosh  by ज्योति प्रसाद जैन - Jyoti Prasad Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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३- शाली के लिच्छवि नरेश चेटक के सप्तम पुत्र, म० भेहावीर के भतुल । लर १०] अकान्डक्षथरय- सथा उसके संघ के ७०० मुनियों पर प्रान काल मे हस्तिनापुर मं राजा बलि ने भीवण उपसभ्थ किया था, जिससे सुनि विष्णु कुभार ने उनकी रक्षा एवं उदार किया था,रक्षावन्वन पर्वारंभ । अकस्विल--- सथवर, दे० अकम्पन । अवद्ध १. बकलऊुदेव य. मट्टाकलऊूदेव (ल. ६४०-७२० ईं०), महान वायक दिमस्वराचाये, मेयाकिक, दारशमिक, वादी एवं प्रत्थकार, जैन स्साय के सथोपरि प्रस्तोता, अकलकू-न्याय के पुरस्कर्ता, देवसंघ (यथ) से सब्बद्ध, बातापी के पश्चिमी चालुक्य नरेशों हारा पूजित, बौडों पर कश्-विजय के लिए प्रसिद्ध, उमास्वाभमिक्ृत तस्वायंसूज की तत््वायंराजबातिक तवा समस्तमदरकृत आप्तमीमांसा की अष्टकती नाम्नी टीकाओं, और लघीयस्त्रव, न्यायविनिश्यच, सिद्धिविनिक्चय, प्रमाणसंग्रह अभूति भहानगरर्थो के भेता, सुन्व नृपति के पुत्र, राजन साहसतलुंग तथा निकलिगनरेक हिमसीतल द्वारा सम्मानित, अनेक शशि» ले० में तथा परवर्ती शाहित्वकारों द्वारा सादर स्मृत एवं प्रशंतित, श्राह्मण एवं बौद्ध नैयायिको द्वारा भी प्रशंसाधाप्त, तथा पूज्यपाद, पूज्यपाद मट्टारक, बादिर्िह, वावीमसिह, आदि अनेक सार्थक विर््प्राप्त, अकलङ्ु नाम के सबेभहान एवं सर्वप्रथम जात जनाचाये । [अने० ३६/२; जेसिभा० ३५/९; शोधाक० १-४ जेसो० १७१-१८० 1 २- भकलद्धु पण्डित, अशगकेलगोलस्य चन्द्रयिरि के ल० १०९८ ई० के पक शि० ले« में उल्लिखित भाचार्प । [जैशिसं० । १६९; शोषांक-१ ] ३-'अकलङ्कुत्रौकिद्य वादिवसांकश'---मूल संघ-देशीगण-पुस्तक- गच्छ-कोण्ककुन्दान्यय के माधनांदि.. कोल्लापुरीय के प्रशिव्स, देककीति (स्व ११६३ ई०) के शिष्य, सुभचन्द जैंबिद्य एवं गण्डविसुक्त बाधिजचतुमुंश् रामचन्द्र न्रैदिस के शभर्मा देतिहासिक ब्यक्तिकोष ह




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