साहित्य और जीवन | Sahitya Aur Jeevan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साहित्य और जीवन १५ रहन-सहन के प्रतीक हं । जब इन निवासियों में बौद्धिक जीवन का विकास होगा, तब ये चीजें बदलेगी ; लेकिन इसके पूवं भी उनमें आध्यात्मिक भावना का प्रवेडा होना चाहिए । ज्यों-ज्यों व्यक्तियों के चरित्रों में परिवतंन आता जाता है, त्यों-त्यों घर-घर और ग्राम-प्राम में संस्कृति तथा सभ्यता का रूप भी बदलता जाता है । जब हम राष्ट्र की आत्मा में एक उच्च जगत्‌ का निर्माण करना प्रारंभ कर देते हूं तब हमारे देश का बाह्य रूप भी सुन्दर तथा सम्मानयोग्य बन जाता है । कोरमकोर कमंशील पुरुषों की अपेक्षा हमें इस समय ऐसे विद्वानों की--अ्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, विचारकों, शिक्षा-विशेषज्ञों तथा साहित्य-सेवियों की--अधिक आंवश्य- कता हे, जो जातीय ज्ञान के क्षेत्र को, जो इस समय गंभीर रेगिस्तान के समान हैं, विचारों की धारा से सींच कर उवेर बना दें ।कवीन्द्र श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसी युग-धर्म के तकाजे को अपनी पुस्तिका नगर ओर ग्राम' (( 210 11126) में बड़ी खूबी के साथ बतलाया हं । उन्होने लिखा ह-- | हमारा उद्देश्य यह हैं कि ग्राम-जीवन की नदी की तह में, जो झाड़- झंखाड़ों और कूड़े-करकट से भर गई है, और जिसमें प्रवाह नहीं रहा, आनन्द की लहर की बाड़ लादें। इस कार्य के लिए विद्वानों, कवियों, गायको तथा कलाकारों के सम्मिलित प्रयत्न को आवश्यकता ह । ये सब मिरुकर अपनी-अपनी भट (ुष्कं म्राम-जीवन को सरस बनाने के लिए) लायंगे । यदि ये लोग ऐसा नहीं करते तो समझना चाहिए कि थे जोंक की तरह हैं, जो ग्रामवासियों का जीवन-रस चूस रहे हूं और उसके बदले में उन्हें कुछ भी नहीं दे रहे। इस प्रकार का शोषण जीवन-रूपी भूमि की उवंरा-शक्ति को नष्ट कर देता है । इस भूमि को बरावर जीवन- रस मिलता ही रहना चाहिए, भौर उसका तरीका आदान-प्रदान ही हं । जो उससे कुछ ले, वह उसे किसी रूप में वापस दे और इस प्रकार दान- प्रतिदान का चक्र बरावर चलता रहे । कवीन्द्र ने इन थोड़े-से शब्दों में लेखकों, कवियों, गायकों और कला-




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