कांजी मत विवेचन | Kanji Mat Vivechan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(रे 2 कर उन्हे एक कमरा बता दिया और दरी बिछवादी । इसके बाद अनुमान ११-१२ बजे होंगे, मैं उनके स्वाध्याय प्रेम का दिग्दर्शन करने गया, वहां मैंने उनको जलकल (नल) से ओक (हाथ) लगाकर बिना छांना पानी पीते देखा और कहा कि-भाई यह कया ? आपके तो झाज उपबास है, पानी पी रहे हैं ! और वह भी बिना छाना १ मेरी वात का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा--क्यों इसमे क्या दोष है! यह तो पुद्गल दै, शरीर भी पुद्गल है । पुद्गलं को पुद्गल ग्रहण फर रहा है । श्रात्मका इस से क्या सम्बन्ध । आत्मा चेतन जल अचेतन, इसलिये इन दोनोंका कोई सम्बन्ध दी नहीं हो.सकता | यह सुनकर मेने उनसे पूछा-- भाई ! आप किस ग्रन्थ का स्वाध्याय करते है ? तो. उन्होंने 'सोनगढ का साहित्य' दिखलाया श्र प्रशंसा की । मैने सोचा धन्य है-ऐसे प्रचार को । ऐसे एक नहीं श्रनेक चंत मेने कलकत्ते मेँ रहते समय देखे । आपको भी देखने मिले होगे ओर चारिका तिरस्कार केसे होता है इसकी भी नजीर देखने मिली होगी | यदह तो स्थानकवाती दिगम्चर जैन बने अब एक द्टोति िगस्परर जनी कैसे होगणए इसका भी सुन लीजिये | लगभग दो साल की बात है चाकस में श्रीमदाचाय वीर- सागरजी अस्वस्थ ये | लोग उनके दशन दो आयां करते । जयपुर समीप है, श्यायद ही ऐसा कोई खंडेलवाल जैन हो,जिसका , इख नं इख संबन्च जयपुर से न हो। इसलिये आयः लोगोंका आवागमन चालू रहता । एक महाशय इंदोर से आये । कलकत्ता




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