अनुराग पदावली | Anurage Pdawali
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
278
श्रेणी :
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श्री सूरदास जी - Shri Surdas Ji
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सुदर्शन सिंह - Sudarshan Singh
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)मनुराग-पदावली थे
खोछते नहीं १ सुरदासजी कहते द कि वद ८ विप्रथकी ) ( इस प्रकार
व्याकुछ होकर ) शरीर त्याग प्राणोके द्वारा उन आनन्दनिधिकी मूर्ति
प्रसुको ( सदाके छिये ) प्राप्त हो गयी--उनसे मिल गयी ।
राग कल्याण
[४]
रति वादी गोपाल सौं ।
दादा दरि खों जान देहु प्रथु, पद परखति हँ भाल सो ॥ १ ॥
संग की खसं स्याम सनसुख भः मोहि परी पद्पाठ सों ।
परवस देष, नेह अंतरगत, कयौ मिलो सैन विसार सौ ॥ २॥
सठ ! दठ करि तूद्दी पछितेहै, यहै भेंट तोहिं बाल सौं ।
सूरदास गोपी तञ तजि कै, तनमय भह दलाल सौ ॥ ३ ॥
(एक ज्राहझ्मण-पत्नी कह रही है--प्रियतम 1) “गोपारसे मेरा
प्रेम बढ गया है । खामी! हाहा खाकर (मै) तुग्हारे चरणोको
मस्तकसे छूती हूँ; ( मुझे उन ) श्रीदरिके समीप जाने दो । मेरे साथकी
सख्यो ( तो ) दयामसुन्दरके सम्मुख ( पहुँच ) गर्यी; ( किंतु ) मेरा
( तुम-जैले ) पझुपाल ( चरवाहे, मूर्ख ) से पाला पढ़ा है । ( ओह ! )
शरीर दूसरेके वराम ओर छृदयमें प्रेम है; ( एेखी दामे उन ) विशाल नेत्रों
वारे ( श्यामसुन्दर ) से केसे मिदँ १ अरे मूखं ! ( अन्तमें ) दठ करके
तु्हीं पश्चात्ताप करोगे; (समझ लो कि ) अपनी तरुणी भार्यासि तुम्हारी यही
(अन्तिम) मेंट है ।” सूरदासजी कहते हैं कि शरीर छोड़कर ( वह )
गोपी ( विपर-पत्नी ) नन्दछालमें तन्मय ( एकाकार ) हो गयी |
राग सारंग
[५]
पिय ! जिन रोके, जान दे ।
दँ रि विरद जरी चति हौं, इती वात मि दान दै ॥ १॥
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