श्रावक प्रतिक्रमण - सूत्र | Shrawak Pratikraman - Sutra
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
168
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)“ उ्या्या '
व्याख्या :
११.
[. किन जीवों की विराधना की हो ? 3
इन जीवों की मैने विराधना की हो; जसे कि एकै-
न्द्रिय = एक रपदां इन्द्रिय वाले प्रथिवी झादि पाँच
स्थावरः दीन्द्रिय = दो स्पशंन श्रौर रसन इन्द्रिय वाले
कीडे प्रादि; त्रीस्द्रिय न तीन स्पदान, रसन, घ्राण
इन्द्रिय वाले जरू कीड़ी रादि; चतुरिन्द्रिय = चार
स्पक्लंन, रसन, घ्राण, चक्षु इन्द्रिय वाले मवखी मच्छर
प्रादि; पञ्चेन्द्रिय = पांच स्पर्शान-त्वचा, रसन = जिह्वा,
घ्राण = नाक, चक्षु = ग्रांख, श्रोत्र = कान इन्द्रिय वाले
सपं मँढक श्रादि।
[ क्रिस तरह की पीड़ा दी हो ? )
सामने झ्राते पैरों से मसले हों, धूल या कीचड़ झ्रादि से
ढँके हों, भूमि पर रगडे हों, एक दूसरे से भ्रापस में
टकराए हों, छूकर पीड़ित किए हों, परितापिह--दुःखित
किए हों, मरण-तुल्य किए हों, भयभीत किए हों, एक
स्थान से दूसरे स्थान पर बदले हों, कि बहुना, प्राण-
रहित भी किए हों, तो मेरा वह सव पाप मिथ्या =
निप्फल होवे ।
जन धमं मे विवेक का बहुत महत्त्व है। प्रत्येक क्रिया में विवेक
रखना, यतना करना, श्रमण एवं श्रावक दोनों साधकों के लिए श्रावश्यक
हैं। जो भी काम करना हो, सोच-विचार कर, देख-भाल कर, यतना
के साथ करना चाहिए । पाप का मूल प्रमाद है, श्रविवेक है । साधक के
जीचन..में विवेक के प्रकाश का बड़ा महत्त्व है ।
'प्ालोचना्यूप' विवेक श्रौर यतना के. संकल्पों का जीता-जागता
~ ---~----- ~~ ~ = ~~~ = = ~ नन
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