भारत में आर्थिक नियोजन | Bharat Me Arthik Niyojan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२१. देश की भावात्मक एकता ओर्‌ सुनियोजिते अथंर्यदसा (छष्प०्‌०४३] [०६९०० ३०१ १०९ ८००] गत कुछ समय पे हुमारे नेतागणा “मावारमक़ एकता! पर भ्रधिकं वर्त देने ल हैं। भावारमक एकता का रपष्ट श्राशम महू है कि हेम सव सोग यह्‌ श्रदुभव करने तर्गे कि हमारा अन्तिम लक्य एक ही है, शरीर वह है सम्पूर्ण देश को उम्नति करना | इस दृष्टि से हम लोगो की मस्तिष्क की संकीर्णता से किप्ठुल टूर रहेगी चाहिए एवं छोटे-मोटे मतरिदों को मुलाकर सामान्य बातीं के सम्बन्ध मे एक मत हो जाना चाहिए । किसी भी राष्ट्र की चहुमुखी प्रगति के लिए भावार्मक एकता नितान्त पराव दयक है, इते सभी लोग स्वीकार करते है। बे यह भी स्वीकार करते हैं कि यदि राष्ट्र श्रो बदतादै तो इसी से व्यक्ति को भी उश्नति होती है, उसकी मानिमर्यादा बढती है शरीर उसकी श्रा्थिक दा में सुधार होता हू । यहाँ यह स्वाभाविक प्रशन उता है कि पादि ऐसा है तो फिर राष्ट्र की एबता के विरोध में घातक तत्व समय-मय पर अपना सिर वयो उठाते है ? कभी भाषा क प्रदन को लेकर भगड़े होते है, तो कभी राज्य के दित का परश तेकर, कौ धर्म रौर सम्य कशो आई मे टेप पाया जाता है तो कभी जावि-पाँति के संकुवित विचारों को उभार कर समाज हें कूद फेलाई जाती है । मावात्मक एकता क्यों कर सम हो ?--यदि कोई भी राष्ट्र सुनियोणिते सर्भ-म्यवस्था के अन्तर्गत प्रगति करना चाहूता है, तो बिना भावात्मक एकता के यह सम्भव नहीं है । “राष्ट्र की एकता दो सुददे बनाने के लिए महू बहु जरूरी है कि देश मे व्याप्त विघटनकारी दक्तियों का मूल कारण खोजा जाए भौर उसे नड़सूतत से नध्ट करने के उपायों पर विचार किया जाए ।' राष्ट्र की भावात्मकं एवा को मवु बनाने के लिए कुछ लोग देश की वर्तमान प्र्थ-यदस्था तथा वदते हुए समय कौ मोग ३६६




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