आकाश के तारे धरती के फूल | Aakash Ke Tare Dharti Ke Phool

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2.26 MB
कुल पष्ठ :
120
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)कचिकी पत्नी“पा खास तरदकी कुश्ती लड़ता हूँ ।पत्नी फिर विधादकी सुद्रामं स्थिर हो गई |कविने कहा--“क्यों अब क्या हुआ हो“छुआ क्या; तुम सुक्ते खोओआग किसी दिन |“प्यों ? कुश्तीमं ता ज़ेवर नहीं जान !””नहीं जाते; ता क्या, दाथ-पेर तो टूटने हु ।'“न मे जुआ खेलता हूँ, न कुश्ती ढड़ता हूँ । यद सब ता में ुमसे
हँसीम कह रहा था रानी“फिर यह कहाँसे जीतकर लाये हा 7(कविताका अर्थ परनी समभ्द नहीं सकती)“मे गाले लगता हूँ और ोगांका याकर नुनाता हूँ । खुश देकरवे सुक्ते इस तरदके इनाम देते हैं ।“श्वेर, गाने जाइनेमें ता काई दल नहीं । दमारे गाँधनें भी उंसी
मीचर चौचेलि जाइता है । दोलि्विमें ढोग उसे सिर पर उठाये फिस्तें
हू | तुम भी चौवोालि जाइत होगे ?””“हूँ ! 1” एक मरी-सी ध्वनि कविने कद्दा और पत्नीकी अंतर देस्वा ।
पत्नीकी आँखांमिं गवकी प्रसन्नता फूट रही थी । पतिकी ऑस्योंमिं आयें
डालकर उसने कहा--“अयकी दोल्यिंमिं तुम हमारे गाँयसं चलना ।
रातको चोपाल्यर एक न्वौवाला तुम कहना; एक दंसी कटेगा । सच कद़ती
हूँ; वड़ा मज़ा रहेगा ।2
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