श्रीमती विश्वास | Shrimati Vishwash

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Shrimati Vishwash by श्रीलक्ष्मीचन्द्र वाजपेयी - Shreelakshmichandra Vajpeyi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रीमती विशवास होठ कभी खलते नहीं ? भ्रौर ये हसते भी नही ” लेकिन मेने उस दिन समाचारपतन्रमे पढाथा कि नैनीताल मे सरोवर के उत्तरवाली चोटी नीचे ठह गई ।-- तो जान पडता है ये कभी-कभी हंसने है । 'श्ौर ये जो कही-कहीं इनसे पानी टपक रहा हे, तो क्या इनके जीवन मे भी कभी कोई दुख ग्राता है ? इनको भी रोने का अवसर मिलता है ? या ऐसा है कि प्रात:काल का समय है, ये ग्रपना मुह थो रहे हों श्रौर इसलिए यह पानी टपक रहा हो ।. नहीं, नही, ऐसी बात नहीं है। ये तो जड है । लेकिन में यह कया देख रहा हूँ ?--यहां तो श्रच्छा खासा भरना कर रहा है । श्रच्छा, तो यहु बातदहै 1 कहने मात्र को ये जड़ है 1 हृदथ इनका करने की तरह रलो से रत्य रहता है । खूब ! श्रौर यह्‌ हरियाली *? ऐसा जान पड़ता है कि बाठोरता श्रौर सृलानियल इन प्वेतों ने एक साथ पाई है । मगर यह तो पुष्प का गुण है कि सुगन्ध निस्सरण के साथ-साथ संभल कर न चलो, तो निकट ही निकला श्रौर उगता हुआ कण्टक धोती, पायजामा श्रौर पेण्ट का स्वागत करबेठेगा । कहने को पहाड जड, मूक, बधिर, षग श्रौर उसमे इतने गुण हैं ? श्रौर ये पहाडी मकान दूर से ऐसे जान पड़ते है कि दवेब्र चादर पर किसी नें लाल रग के छीटे डाल दिये हो । इतनी हर से इन मकानों के आगे खडे हए श्रादमौ मृनभे से रेगदे हुए जान पडते हे--श्रदभुतं । यहाँ आने पर यह प्रतीत हुआ कि मरोखे भी मनप्यको कितना धोखा देती हे । श्रच्छा, इन पहाडो को जाडा कभी नही लगता ” इनके ऊपर बर्फ की ठडक मी कोई प्रभाव नहीं डालती । इनको नमूनिया नही होता कभी ? क्या पागलपनहै? में यह भूल ही जाता हैं कि ये जड हुः यद्यपि यह स्वीकार करने को जी नहीं चाहता कि ये जड़ हो सकते हे । जड पदाथं भी कही इतने सुन्दर होते ह ? ग्रच्छा प्रह्न है- एकदम मृखंतासे भरा हृश्रा ४ सुन्दरता सदा जड होती है, निभेम, कठोर । न विनय की दहु कभी परवाह करती है, न १६




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